Friday, October 30, 2026
Tuesday, May 20, 2025
समकालीन बहुरंगी दोहों का संकलन है : नावक के तीर
“नावक के तीर” हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 51 दोहाकारों का साझा दोहा संकलन है| जिसमें प्रत्येक दोहाकार के 15-15 दोहे सचित्र संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाशित किये गए हैं| संकलन में जहाँ वरिष्ठ दोहाकार डॉ रामनिवास ‘मानव’, घमंडीलाल अग्रवाल, मनोज ‘अबोध’, रघुविन्द्र यादव, योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’, राजपाल गुलिया, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, कमलेश व्यास ‘कमल’ आदि शामिल हैं वहीं युवा दोहाकार राहुल शिवाय, गरिमा सक्सेना, सत्यम भारती, संजय तन्हा, अनंत आलोक, अमर पाल, कुलदीप कौर ‘दीप’, धर्मपाल ‘धर्म’ आदि शामिल हैं|
इनके अलावा डॉ मधु
प्रधान, सुशीला शील, हरिराम पथिक, संदीप मिश्र ‘सरस’, डॉ तुलिका सेठ, हलीम आईना,
अलका शर्मा, ओंकार सिंह ‘विवेक’, सुरेश कुशवाह ‘तन्मय’, विभा राज ‘वैभवी’, संदीप
सृजन, सरिता गुप्ता, सूर्य प्रकाश मिश्र, रमा प्रवीर वर्मा, डॉ मनोज कामदेव, कृष्ण
सुकुमार, शीतल वाजपेयी, नीलम सिंह, डॉ फहीम अहमद, बृजराज किशोर ‘राहगीर’, वृन्दावन
राय ‘सरल’, डॉ लक्ष्मी नारायण पाण्डेय, किरण प्रभा, विनयशील चतुर्वेदी, रामकिशोर
सौनकिया किशोर, डॉ मानिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ गीता पाण्डेय ‘अपराजिता’, व्यग्र
पाण्डेय, डॉ नूतन शर्मा ‘नवल’, प्रोमिला भारती, सुरेन्द्र कुमार सैनी, प्रबोध
मिश्र ‘हितैषी’. डॉ चंद्रपाल सिंह यादव, अजय अज्ञात और मोहन द्विवेदी शामिल
हैं|
दोहकारों ने जीवन जगत से जुड़े विभिन्न विषयों
यथा सामाजिक कुरीतियों, विद्रूपताओं, नैतिक पतन, स्वार्थ लोलुपता, पर्यावरण ह्रास,
संवेदनहीनता, बुजुर्गों की उपेक्षा, किसानों की पीड़ा, राजनैतिक पतन, भ्रष्टाचार,
दहेज़, टूटते परिवार, दरकते रिश्ते, माँ, हिंदी, नारी, बेटी, प्रकृति, संस्कृति आदि
पर दोहे लिखे हैं| ये दोहे युगबोध के दोहे हैं और अपने समय से सवाल करते हैं|
अधिकाँश दोहकारों ने बिम्बों, प्रतीकों,
अलंकारों, मुहावरों का प्रयोग करके अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली और दमदार बनाया
है| हालांकि कुछ लोग अभी भी उपदेशात्मक और धार्मिक दोहों पर ही अटके हुए हैं| यों
तो इस संकलन के 80 प्रतिशत दोहे उद्दृत करने योग्य हैं, लेकिन हर चीज की एक सीमा
होती है| इसलिए कुछ समकालीन दोहे बानगी स्वरुप प्रस्तुत हैं-
सूख गई संवेदना, मरी मनों की टीस|
कहाँ सिया को ले गई, स्वर्ण हिरण की चाह|
ये रोटी को खोजता, वह सोने की खान|
हेरा-फेरी ने किया, यह कैसा विध्वंस|
जिस दिन से मेरी हुई, गर्म जरा-सी जेब|
संकलन के अधिकांश दोहे कथ्य और शिल्प दोनों
दृष्टि से कसे हुए और परिपक्व हैं| लेकिन कुछ दोहों में छंद दोष रह गए हैं| पृष्ठ
22 पर “पल-पल गढ़ा समय तुझे” में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 37 पर “फ़ैल रहा है यह
रोग” में भी मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 39 पर “फैलाये परकास” में जबरन तुक मिलाने
का प्रयास किया गया है| इसी पृष्ठ पर “बिन पंखों से नाप ले, धरती अरु अस्मान” भी
अशुद्ध है| पृष्ठ 42 पर “न्याय धर्म की जीत हुई” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं| पृष्ठ
45 पर “सावन भादों चेत” में भी ज़बरन तुक मिलाने का प्रयास किया गया है| पृष्ठ 46
“दुख के दरवाजे घुसे, आशाओं की बेल| लिपटे हरित बबूल से, दूध-छाँछ का खेल||” में कवि
क्या कहना चाहता है स्पष्ट नहीं है| पृष्ठ 50 “इतिहास के पृष्ठ यहाँ” में चरण की
शुरुआत पचकल शब्द से हो रही है, जिसके कारण लय बाधित है| पृष्ठ 52 पर “मर गया वह
गरीब” में प्रारम्भिक द्विकल के बाद त्रिकल आने से लय बाधित है| इसी पृष्ठ पर
“रंग-रूप से चले नहीं” में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 53 पर “पंछी खेतिहर ढोर सब”
में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 54 पर “पीठ से सटा पेट” तथा “चमक बढ़ गई गाँव की”
में प्रारंभिक त्रिकल के बाद द्विकल आने से लय बाधित है| पृष्ठ 79 पर “चेहरों की
रेखाओं में” इस चरण में मात्राएँ बढ़ गई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ
84 पर “उसी राम की रक्षा को” में भी मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा लघु
नहीं है| पृष्ठ 84 पर “हृदय विवेक विहीन कवि” में लय बाधित है| पृष्ठ 85 पर “अभी
उमर वारी मेरी” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ
86 पर “बोला यह तो हम मेरा” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं
है| पृष्ठ 86 पर “हो गये अरुण कपोल” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ
86 पर “खिली-खिली-सी लिली भी” में 11वीं मात्रा लघु नहीं है, जो अनिवार्य है| पृष्ठ
89 पर “करो सदा गुणगान है, बहती है रसधार” में अर्थ स्पष्ट नहीं है| पृष्ठ 89 पर ही
‘प्रवाह’ का तुकांत शब्द ‘भाव’ लिया गया है, जो अशुद्ध है| पृष्ठ 91 पर “समझ-समझ
का फैर” में ज़बरन तुक मिलाने का प्रयास किया है| पृष्ठ 92 पर “गुरु कृपा इस जगत
में” में मात्राएँ कम हो गई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ 92 पर ही “फाग राग संग बाजे”
में 11वीं मात्रा लघु नहीं है, लय बाधित है| पृष्ठ 92 पर ही “वो रात की नींद” मात्राएँ
कम हो गई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ 97 पर अंतिम दोहे में “छाप” का तुकांत “भाँप”
लिया गया है, जो अशुद्ध है| पृष्ठ 97 पर “स्वयं दौड़ती आएगी” में मात्राएँ बढ़ी हुई
हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 102 पर “अंत समय रह जाएगा” में मात्राएँ
बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 105 पर “सागर में तो आयेंगे”
में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 106 पर “दूर रहें
पर मिले ज्यों” में 11वीं मात्रा लघु नहीं है| पृष्ठ 106 पर “बुनो न सामासिक पदों,
के संशय के वर्ग” में लय भंग है|
पुस्तक में प्रूफ की ढेरों अशुद्धियाँ है, जो
ऐसे अखरती हैं जैसे स्वादिष्ट खीर में कंकर हों| इनके कारण भी कुछ दोहों में छंद
दोष उत्पन्न हुए हैं| जैसे दिखा को देखा, दुख को दुःख, अदबी को आदबी, बढ़ा को बड़ा,
जानें को जाने, आहट को आहत, शृंगार को श्रृंगार और श्रींगार, ‘को’ को के, उद्गार
को उद्धार, मुझको को मूझको, मुकुलित को मुकूलित लिख दिया गया है| पृष्ठ 66 के एक
दोहे से 6 मात्रा का शब्द ‘मातृसदन” ही गायब है, तो पृष्ठ 117 पर नेकी शब्द से ‘ने’
गायब है| बहुत से दोहों में या तो यति गायब है या गलत जगह लगाई हुई है| पहली
भूमिका और उसमें उद्दृत किये गए दोहों में भी प्रूफ की अशुद्धियाँ हैं और दूसरी
में भी|
संकलन में उपदेशात्मक दोहे भी शामिल किये गए हैं
और आय, जाय, पाय, लगाय जैसे शब्दों के उपयोग वाले भी, जिनकी समकालीन दोहे में कोई
जगह नहीं है| देशज और विदेशी शब्द यदि दोहे की प्रभावोत्पादकता बढ़ाते हों, तो
प्रयोग करने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन अंग्रेजी के रेपिस्ट शब्द का हिंदी में
बहुवचन रेपिस्टों मुझे उचित नहीं लगा|
इस 120 पृष्ठीय पेपरबैक कृति का आवरण, छपाई,
प्रस्तुतिकरण और कागज़ सब स्तरीय हैं| मूल्य 250 रुपये भी वाजिब ही कहा जाएगा| कुल मिलाकर
यह एक अच्छा और पठनीय दोहा संकलन है जो दोहा साहित्य को समृद्ध करेगा| अकादमी का
यह एक सराहनीय प्रयास है, इससे नए दोहकारों को मंच मिला है, वहीं पाठकों को वरिष्ठ
दोहकारों के भी दोहे पढ़ने को मिलेंगे|
सम्पादक सुधाकर पाठक जी और टीम को बधाई| आशा है अगला संस्करण त्रुटियों को दूर करके प्रकाशित करवाएंगे|
रघुविन्द्र यादव
Saturday, April 12, 2025
दोहों की परम्परा को सुदृढ़ करने वाला संग्रह : नागफनी के फूल
दोहा साहित्य की वह विधा है जिसके द्वारा कवि कम से कम शब्दों में, कम से कम समय में अधिकतम बात कहने में सफल होता है| दोहा पाठक या श्रोता की चेतना को एकदम से झकझोरता है| दोहे के अर्थ को आम बौद्धिक व्यक्ति आसानी से समझ सकते हैं| रहीम से लेकर आज तक इसकी लोकप्रियता में कहीं कोई कमी नहीं आई है|
यदि कवि संवेदनशीलता के साथ सूक्ष्म और तटस्थ दृष्टिकोण रखते हुए विविध विषयों का समावेश कर, शब्द-शक्ति का बेहतर उपयोग करता है तो दोहा और अधिक प्रभावी बन जाता है| रघुविन्द्र यादव नयी पीढ़ी के वे दोहाकार हैं जो अपने दोहों के माध्यम से कुव्यवस्था, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण, मानवीय संबंधों की बदलती परिभाषा और आम आदमी के दुःख-दर्द को केंद्र में रखकर सशक्त तरीके से, नूतनता के साथ अपनी बात कहने में सक्षम हैं|
कुल छह पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके रघुविन्द्र यादव कि कृति "नागफनी के फूल" दोहा विधा में उनका पहला संग्रह है| जिसमें तुझ में मेरी आस्था, नागफनी के फूल, नेता लूटें देश को, भूखा रहा अवाम, भ्रष्ट व्यवस्था हो गई, दौलत की दीवार, बूँद-बूँद में ज़हर, जनभाषा हिंदी बने, वीरों का सम्मान आदि 25 शीर्षकों के अंतर्गत 424 दोहे शामिल हैं|
रघुविन्द्र यादव सहित और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति हैं| वे सजग्त्ता से अपनी निष्ठा को न्यायप्रियता के साथ जोड़कर लेखनी के माध्यम से अपना कर्तव्य निभाने का वादा करते हैं| वे सामाजिक संरचना में आये परिवर्तन की गंभीर विवेचना करते हैं| वे जानते हैं कि मानवता की भलाई और दीर्घकालीन सुखद जीवन के लिए अच्छे लोगों का होना आवश्यक है| लेकिन कवि वर्तमान परिस्थितियों से आहत है| वह सभी से एक प्रश्न पूछते हैं| वह चाहते हैं कि सभी लोग इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ें, आत्म्विश्लेष्ण करें और सकारात्मक परिवर्तन के लिए पहल करें-
आँगन में उगने लगे, नागफनी के फूल||
कवि आम आदमी को ही भारत की असली तस्वीर मानता है| वे शाइनिंग इंडिया के भुलावे से दूर अंतिम व्यक्ति के दुःख-दर्द को महसूस करते हैं| साम्प्रदायिकता और महँगाई से आम आदमी कितना पीड़ित है, यह कुर्सी पर बैठे सफेदपोश नहीं जानते-
दुखिया के दोनों मरे, बेटा और सुहाग||
आज भी हमारा समाज अन्धविश्वास, कुरीतियों, रूढ़ियों और पाखण्ड से ग्रस्त है| इन पर खर्च होने वाला धन अगर समाज विकास पर खर्च हो तो उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है| लेकिन दिखावे का जीवन जीने के आदि हो चुके लोग आज भी उसी पुरानी पतन की राह पर हैं| कवि का कोमल हृदय बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और तिरस्कार से भी आहत है| विभिन्न उदेश्यों को लक्षित करता उनका एक दोहा देखिये-
मरने पर उसके हुआ, देशी घी का भोज||
हरियाणा पूरे देश में खापों के फरमानों की वजह से चर्चा में रहता हा खाप पंचायतें समाज के सौहार्द और मनुष्य की भलाई के लिए कार्य करें तो प्रशंसनीय हैं, लेकिन अगर वे कानून अपने हाथ में लें तो वह संविधान और देश की गरिमा के खिलाफ है| सबके अपने नैतिक मानदंड हो सकते हैं, लेकिन इन्हें जाति या धर्म के नाम पर दूसरों पर थोपना तानाशही है-
जाति धर्म के नाम पर, कुचल रहे अरमान||
वर्तमान दौर में कुर्सी की चाह इतनी प्रबल है कि हर कोई बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है-
नैतिकता की राह में, घायल पड़े कबीर||
यहाँ नाम का ही लोकतंत्र है| आजादी के बाद से आज तक सत्ता चुनिन्दा हाथों में ही रही है| कवि वंशवाद की राजनीति का विरोध करता है-
राज खडाऊं कर रही, बदला कहाँ निज़ाम||
न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तम्भ होती है, लेकिन हमारी न्याय प्रणाली धीमी गति से कार्य करती है| इसलिए लोगों को समय से न्याय नहीं मिल पाता| न्याय में देरी भी अन्याय के समान है-
हुआ केस का फैसला, बीस बरस के बाद||
धार्मिक आस्था का दोहन आज चरम पर है| अनपढ़, ढोंगी बाबा भी दर्शन-शास्त्र की बात करते हैं और गोल-गोल घुमाते हुए सामने वाले को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं| महिलायें उनका आसान शिकार होती हैं-
डेरे में सेवा करे, बाबा हुआ निहाल||
पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्त्ता से कवि बने श्री यादव प्रकृतिवादी हैं| वे पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन को देखते-समझते हैं| एक बेहद रोचक नूतन प्रयोग के साथ वे जल की महिमा बताते हुए कहते हैं-
जलते को जल दे बुझा, जल जीवन का सार||
रघुविद्र यादव के दोहों में पैनापन. विविधता, नूतन प्रयोग, आम आदमी के हित में बहने वाली प्रवाहमय शैली, कलात्मकता व आशावाद है| उनके दोहों में कटु जीवन यथार्थ को, नग्न युगबोध को धारदार अभिव्यक्ति मिली है| रघुविन्द्र यादव के दोहे कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से हमें आश्वस्त करते हैं|
पुस्तक का आवरण आकर्षक, छपाई सुंदरा और कागज़ स्तरीय है| प्रूफ की कोई अशुद्धि नज़र नहीं आती| बहर्लाक रघुविन्द्र यादव का यह दोहा संग्रह न केवल दोहा के प्रशंसकों को अपितु अन्य विधाओं के चाहने वालों को भी पसंद आएगा, ऐसी आशा है| दोहों की परम्परा को सुदृढ़ करने वाली यह पुस्तक स्वागत योग्य है|
मंडलाना, नारनौल
Monday, September 16, 2024
दुरूहता से दूर, काव्य-रस से भरपूर दोहे
दुरूहता से दूर, काव्य-रस से भरपूर दोहे
शब्द-कुठारा चल पड़ा, करने जमकर वार।
आये याद कबीर दोहाकार रघुविन्द्र यादव का तीसरा दोहा संग्रह है| कवि का आक्रोश है– व्यवस्था की कुचालों, सत्ता के दुराचरण, वैयक्तिक आडम्बरप्रियता, रिश्तों के खोखलेपन, अंधभक्ति, तथाकथित संतों की शर्मनाक करतूतों, माता-पिता के प्रति संतान के उपेक्षित व्यवहार, स्वार्थ की पराकाष्ठा, किसान-मजूर की दुर्दशा, घटते भाईचारे, मीडिया की कारगुजारी, नशाखोरी, संवेदनहीनता, कूपमण्डूकता तथा सामाजिक भेदभाव के प्रति। विसंगतियों, विद्रूपताओं को केन्द्र में रखकर कलम चलाई गई है, वहीं कवि मानव मात्र को संदेश देना नहीं भूला है। पीड़ा के इन मजमूनों में खुदा को भी नहीं बख़्शा गया–
हिम्मत है तो या खुदा, जग में आकर देख।।
जीवन है तो समस्याएँ हैं; उनके निराकरण हेतु कवि का आह्वान है–
हाथ बढाओ साथियो, मन से खौफ निकाल।
संग्रह के अनेक दोहे कालजयी कोटि के हैं, यथा –
कुत्ता बेशक भौंक ले, कितनी ऊँची टेर।
बिना तपे बनता नहीं, लोहा भी फौलाद।।
दिन-दिन बिगड़ते माहौल को देखकर कवि चेताता है-
गलत-सही का फैसला, अगर करेगी भीड़।
भाईचारा छोड़िये, नहीं बचेंगे नीड़।।
आमजन को सचेत किया है कि कुपात्र को सत्ता सौंपने से बचें अन्यथा–
झूठों को सत्ता मिले, भांड़ों को सम्मान।
हिस्से में ईमान के, तपता रेगिस्तान।।
दोहाकार की प्रश्नाकुलता साझी प्रश्नाकुलता हो जाती है जब वे कहते हैं–
भूखा है हर आदमी, सबके लब पर प्यास।
सरकारें करती रहीं, जाने कहाँ विकास।।
पाठक की अंतश्चेतना को झकझोरता एक अन्य उदाहरण है–
हिम्मत टूटी हंस की, डोल गया विश्वास।
काग मिले जब मंच पर, पहने धवल लिबास।।
भाव-गहनता के आधार पर मैं इस दोहे को सबसे ऊपर रखती हूँ–
जीवन भर लड़ता रहा, मैं औरों से युद्ध।
वो खुद से लड़कर हुआ, पल भर में ही बुद्ध।।
भाव व कला की उत्कृष्टता का नमूना देखिए–
कनक खेत में खप गई, सस्ती बिकी कपास।
रामदीन रुखसत हुआ, खा गोली सल्फास।।
कवि की व्यंजना-क्षमता को प्रमाणित करता है यह दोहा–
कितने दर्द अभाव हैं, झोपड़ियों के पास।
फिर भी महलों की तरह, रहती नहीं उदास।।
कवि पुन: पुन: सत्ता के स्वभाव पर चुटकी लेता नहीं थकता–
सत्ता ने अब कर लिए, आँख, कान सब बंद।
उसको शब्द विरोध के, बिलकुल नहीं पसंद।।
प्रतीक शैली, विरोधाभास अलंकार तथा कटूक्तियों का खुलकर प्रयोग किया गया है, प्रत्येक का एक-एक उदाहरण पेश है–
सूरज की पेशी लगी, जुगनू के दरबार।
हुई गवाही रात की, दोषी दिया करार।।
खुद को अब हीरा कहो, बढ़-चढ़ बोलो बोल।
जितना बढ़िया झूठ है, उतना ऊँचा मोल।।
भात-भात करते मरी, भारत की संतान।
शासक गंगा गाय की, छेड़ रहे हैं तान।।
दोहों में लयात्मकता, गेयता, ध्वन्यात्मकता के गुण विद्यमान हैं। कला पक्ष, भाव-पक्षपर खरे उतरते हैं ये दोहे। संग्रह का मुखपृष्ठ अर्थपूर्ण व मूल्य वाज़िब है। दोहाकार ने आत्मकथ्य में अपने दोहों की चोरी की बात लिखी है। देखिए न, मोतियों के सामने कंकरों की क्या बिसात? चोरी करनी ही है तो यूनीक की करे। मेरे कथन का अर्थ चौर्य-कर्म को मान्यता देने से नहीं, कवि के रचना-कौशल से है। साहित्यिक गलियारों में प्राय: पाठकों की कमी का रोना रोया जाता है। मेरे मतानुसार लेखन में दम हो तो पाठकों की कमी नहीं। वस्तुत: यही है लेखन की सार्थकता और कवि/लेखक की सफलता। कवि की इस चाहना से भला कौन सहमत नहीं होगा–
पढ़ पायेंगे क्या कभी, ऐसा भी अख़बार।
जिसमें केवल हो लिखा, प्यार, प्यार बस प्यार।।
रघुविन्द्र यादव डंके की चोट पर नाद करते हैं–
बेशक जाए जान भी, सत्य लिखूँगा नित्य।
क्या है बिना ज़मीर के, जीने का औचित्य?
कामना है, कवि का यह हौंसला नित नई बुलंदी पाता रहे। संग्रह के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएँ।
-कृष्णलता यादव
गुरुग्राम 122001
कबीराना अंदाज़ के दोहे : आये याद कबीर
कबीराना अंदाज़ के दोहे : आये याद कबीर
अर्द्धसम मात्रिक छंद दोहा बेहद प्राचीन सनातनी छंद रहा है। समय,काल और परिस्थितियों के साथ इसका कथ्य भले ही बदला हो, किंतु इसका मानक शास्त्रीय पक्ष एवं शिल्प ज्यों का त्यों रहा है। भक्ति काल,रीति काल तथा आधुनिक काल के दोहों का अपना-अपना महत्व है। अनेक संत कवियों को उनके दोहों की रचनाधर्मिता ही अमर कर गई।समीक्ष्य कृति 'आये याद कबीर' दोहा के पर्याय कहे जाने वाले रचनाकार रघुविंद्र यादव का तीसरा दोहा संग्रह है,जिसमें मानक दोहा प्रारूप के तमाम मूलपक्ष देखे जा सकते हैं। कबीराना अंदाज,तल्ख मिजाज तथा विरोध की जनपक्षीय आवाज इस संग्रह की समग्र रचनाधर्मिता कि केंद्र में निहित है।
दोहाकार सामाजिक विसंगतियों तथा विद्रूपताओं चित्रणभर ही नहीं करता, यथोचित शाब्दिक लताड़ भी मारता है। कुछ बानगियांँ देखिएगा-
पीट रहे हैं लीक को, नहीं समझते मर्म।
आडंबर को कह रहे, कुछ नालायक धर्म।।
गिरवी दिनकर की कलम,पढ़ें कसीदे मीर।
सुख-सुविधा की हाट में, बिकते रोज कबीर।।
ज्ञानी-ध्यानी मौन हैं,मूढ़ बांँटते ज्ञान।
पाखंडों के दौर है,सिर धुनता विज्ञान।।
संग्रह के तमाम दोहे व्यवस्था तथा सामाजिक दोगलेपन पर करारी चोट करते हैं। संग्रह में प्रतीकों का सहज समावेश प्रभाव छोड़ता है-
ख़ूब किया सय्याद ने, बुलबुल पर उपकार।
पंख काट कर दे दिया, उड़ने का अधिकार।।
हिम्मत टूटी हंस की, डोल गया विश्वास।
काग मिले जब मंच पर, पहने धवल लिबास।।
झूठ युधिष्ठिर बोलते, करण लूटते माल।
विदुर फिरौती ले रहे, केशव करें मलाल।।
विरोध के मूल स्वर में पगे इन दोहों से के माध्यम से सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में निरंतर हो रहे अवमूल्यन को सहज ही समझा जा सकता है-
नैतिकता ईमान से, वक्त गया है रूठ।
सनद मांगता सत्य से, कुर्सी चढ़कर झूठ।।
कहांँ रहेंगे मछलियांँ, सबसे बड़ा सवाल।
घड़ियालों ने कर लिए, कब्जे में सब ताल।।
आओ दोहा लिखें
दोहा कैसे लिखें
दोहा लिखने के नियम
दोहा लिखने के लिए मात्राओं की गिनती कैसे करें
दोहे का व्याकरण
आज दोहा लोकप्रियता के शिखर पर, इसलिए हर रचनाकार चाहता है कि वह भी दोहे लिखे| किन्तु दोहा जितना छोटा और सीधा दिखता है लिखना उतना सरल नहीं है| परिणामस्वरूप बहुत कम लोग ही मानक दोहे लिख पाते हैं| क्योंकि-दीरघ दोहा अर्थ के, आखर थोरे आहि|
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूद चलि जाहि||
अर्थात दोहे में अक्षर भले ही कम होते हैं, लेकिन उसे दीर्घ अर्थ वाला होना चाहिए और दोहाकार को नट की भांति कुशल होना चाहिए| जैसे एक नट अपने सारे शरीर को साध कर कुंडली में से निकाल देता है वैसे ही दोहाकार को भी दोहा रचने में सक्षम होना चाहिए|
दो पंक्तियों और चार चरणों में 13-11, 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राओं से लिखा जाने वाला छंद दोहा कहलाता है। इससे कम या अधिक मात्राओं वाली रचना मानक दोहा की श्रेणी में नहीं आती। मात्राओं के अलावा दोहे का कथ्य, शिल्प, भाव और भाषा भी प्रभावशाली हो।
आधुनिक दोहा को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान करने वाले आचार्य देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के अनुसार-''दोहा छंद की दृष्टि से एकदम चुस्त-दुरुस्त और निर्दोष हो। कथ्य सपाट बयानी से मुक्त हो। भाषा चित्रमयी और संगीतात्मक हो। बिंब और प्रतीकों का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में हो। दोहे का कथ्य समकालीन और आधुनिक बोध से संपन्न हो। उपदेशात्मक नीरसता और नारेबाजी की फूहड़ता से मुक्त हो।"
डॉ. अनंतराम मिश्र ‘अनंत’ ‘दोहे की आत्मकथा’ में लिखते हैं- ''भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण और रस मेरी आत्मा है। कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा हृदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है। प्रथम-तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय-चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं।"
आशय यह कि प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 और दूसरे तथा चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ जोड़ लेने भर से दोहा नहीं बन जाता। इसके लिए और भी बहुत कुछ चाहिए। दोहे के प्रथम और तृतीय चरण का समापन लघु गुरु या तीन लघु से होना अनिवार्य है। इसी प्रकार दोहा के दूसरे और चौथे चरण का अंत गुरु लघु से होना अनिवार्य है।
दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है, इसलिए सबसे पहले मात्राओं की गणना का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। जब तक मात्राओं की गणना का सही ज्ञान नहीं होगा मानक दोहा नहीं लिखा जा सकता। दोहे के व्याकरण पर यूँ तो विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है| ‘छंद प्रभाकर’ से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक इस छंद की जानकारी मिलती है| किन्तु नए रचनाकारों की सुविधा के लिए यहाँ मात्राओं की गणना से लेकर दोहे की रचना तक की जानकारी सरल भाषा में देने का प्रयास किया जा रहा है|
मात्राओं की गणना निम्रप्रकार की जाती है-
हिन्दी भाषा के सभी व्यंजनों की एक मात्रा (।) मानी जाती है। लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ की भी (।) मात्रा ही मानी जाती हैं। जबकी दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ ओ और औ की मात्राएँ दीर्घ (ऽ) मानी जाती हैं। व्यंजनों पर लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ आ रहे हों तो भी मात्रा लघु (।) ही रहेगी। किंतु यदि दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राएँ आ रही हों तो मात्रा दीर्घ (ऽ) हो जाती है।अर्ध-व्यंजन और अनुस्वार/बिंदु (.)की आधी मात्रा मानी जाती है। मगर आधी मात्रा की स्वतंत्र गणना नहीं की जाती। यदि अनुस्वार अ, इ, उ अथवा किसी व्यंजन के ऊपर प्रयोग किया जाता है तो मात्राओं की गिनती करते समय दीर्घ मात्रा मानी जाती है किन्तु स्वरों की मात्रा का प्रयोग होने पर अनुस्वार (.) की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती।
आधे अक्षर की स्वतंत्र गिनती नहीं की जाती बल्कि अर्ध-अक्षर के पूर्ववर्ती अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती है। यदि पूर्ववर्ती व्यंजन पहले से ही दीर्घ न हो अर्थात उस पर पहले से कोई दीर्घ मात्रा न हो। उदाहरण के लिए अंत, पंथ, छंद, कंस में अं, पं, छं, कं सभी की दो मात्राए गिनी जायेंगी इसी प्रकार शब्द, वक्त, कुत्ता, दिल्ली इत्यादि की मात्राओं की गिनती करते समय श, व, क तथा दि की दो-दो मात्राएँ गिनी जाएँगी। इसी प्रकार शब्द के प्रारंभ मेें आने वाले अर्ध-अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती जैसे स्वर्ण, प्यार, त्याग आदि शब्दों में स्, प् और त् की गिनती नहीं की जाएगी। प्रारम्भ में संयुक्त व्यंजन आने पर उसकी एक ही मात्रा गिनी जाती है। जैसे श्रम, भ्रम, प्रभु, मृग। इन शब्दों मेें श्र, भ्र, प्र तथा मृ की एक ही मात्रा गिनी जाएगी।
अनुनासिक/चन्द्र बिन्दु की कोई गिनती नहीं की जाती। जैसे- हँस, हँसना, आँख, पाँखी, चाँदी आदि शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग होने के कारण इनकी कोई मात्रा नहीं मानी जाती।
दोहा यदि लयात्मक है तो उसमें छंद दोष होने की सम्भावना न के बराबर होती है| किन्तु जिन लोगों को संगीत का ज्ञान नहीं है उनके लिए इसे तय करना मुश्किल होता है, इसलिए कौन से चरण में क्या होना चाहिए और क्या वर्जित है उसकी चर्चा करते हैं-
दोहे का प्रथम और तृतीय चरण-
दोहा लयबद्ध रहे इसके लिए इसे केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं वाले शब्दों से ही शुरू किया जाता है, पाँच मात्राओं वाले शब्द से दोहा का कोई चरण शुरू नहीं किया जाता। प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के मात्रिक गणों के हिसाब से कुल 34 भेद छंद विशेषज्ञों ने तय किए हैं। इसी प्रकार दूसरे और चौथे चरण के लिए 18 भेद तय किए हैं। जिनका क्रमवार विवरण निम्रांकित है-दो मात्राओं से दोहा शुरू करने के विद्वानों ने मात्रिक गणों के अनुसार 12 भेद बताए हैं-
2, 2, 2, 2, 2, 3 जैसे- दुख-सुख में जो सम रहे (होता सच्चा संत)2, 2, 2, 2, 3, 2 जैसे- अब तक भी है गाँव में (कष्टों की भरमार)
2, 2, 2, 4, 3 जैसे- घर तो अब सपना हुआ (महंगी रोटी दाल)
2, 2, 4, 2, 3 जैसे- दिन-दिन बढ़ते जा रहे (झूठ और पाखंड)
2, 4, 2, 3, 2 जैसे- इक मानव की भूख है (इक सागर की प्यास)
2, 4, 2, 5 जैसे- धन-दौलत को मानते (जो अपना भगवान्)
2, 2, 4, 5 जैसे- घर की खातिर चाहिए (त्याग समर्पण प्यार)
2, 2, 4, 3, 2 जैसे- धन की अंधी दौड़ में (दौड़ रहे हैं लोग)
2, 5, 4, 2, जैसे- सब गद्दार निकाल दो (ले संकल्प महीप)
2, 6, 3, 2 जैसे- माँ सुलझाती गाँठ सब (पथ करती आसान)
2, 2, 6, 3 जैसे- नख भी कटवाया कभी (आता है क्या याद)
2, 6, 2, 3 जैसे- पढ़ पायेंगे क्या कभी (ऐसा भी अखबार)
दो मात्रा से प्रारम्भ होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में शुरू में दो मात्रा के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार प्रारंभ में दो के बाद चार मात्रा आने पर तीन मात्रा नहीं आती। साथ ही शुरू में तीन बार दो-दो मात्रा वाले शब्द आ रहे हों तो उनके बाद भी तीन मात्रा नहीं आती। प्रारंभ में दो मात्रा के बाद छह मात्रा आने पर उसके बाद चार मात्रा नहीं आती।
तीन मात्राओं से प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के आठ भेद बताए गए हैं-
3, 3, 2, 3, 2 जैसे- सजे हुए हैं ताज में (बिन खुशबू के फूल)3, 3, 2, 2, 3 जैसे- प्यार दिनों दिन बढ़ रहा (यूं यारों के बीच)
3, 3, 2, 5 जैसे- निकल पड़ा जो ढूँढने (पाई उसने राह)
3, 5, 5, जैसे- बम्ब, धमाके, गोलियां (खून सने अखबार)
3, 5, 2, 3 जैसे- कोख किराये पर चढ़ी (ममता हुयी नीलाम)
3, 3, 4, 3 जैसे- नया दौर रचने लगा (नए-नए प्रतिमान)
3, 5, 3, 2 जैसे- एक अकेली जान अब (चारों पर है भार)
3, 3, 5, 2 सास-ससुर लाचार हैं (बहू न पूछे हाल)
शुरू में तीन मात्रा शब्द के बाद दो, चार और छह मात्रा वाले शब्द नहीं आते। इसी प्रकार शुरू में तीन के बाद पाँच मात्रा हों तो उसके बाद चार मात्रा वाला शब्द नहीं आएगा।
चार मात्राओं से दोहे का प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के 10 भेद विद्वानों द्वारा बताए गए हैं-
4, 4, 3, 2 जैसे- मंदिर मस्जिद चर्च में (हुआ नहीं टकराव)4, 4, 2, 3 जैसे- देवी कहता है जिसे (रहा गर्भ में मार)
4, 4, 5 जैसे- गाड़ी, बँगले, चेलियाँ (अरबों की जागीर)
4, 2, 4, 3 जैसे- चंदन वन गायब हुआ (उगने लगे बबूल)
4, 2, 2, 2, 3 जैसे- गाँवों में भी आ गया (शहरों वाला रोग)
4, 2, 2, 3, 2 जैसे- मरना है हर हाल में (सुन ले अरे किसान)
4, 2, 2, 5 जैसे- लिखने का क्या फायदा (कलम अगर लाचार)
4, 3, 3, 3 जैसे- अच्छा हुआ न मिल सके (गंजों को नाखून)
4, 2, 5, 2 जैसे- दोनों दल खुशहाल हैं (करता देश विलाप)
4, 3, 4, 2 जैसे- देने लगा समाज भी (पैसे को अधिमान)
चार मात्रा से शुरू होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में प्रारंभिक चार के बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार यदि चार मात्रा वाले शब्द के बाद दो मात्रा वाला शब्द आ रहा हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।
छह मात्राओं वाले शब्द से दोहे के प्रथम और तृतीय चरण की शुरूआत करने के चार भेद होते हैं-
6, 2, 2, 3 जैसे- चौराहों पर लुट रही (अबलाओं की लाज)6, 2, 3, 2 जैसे- सुविधाओं की चाह में (बिकता है ईमान)
6, 4, 3 जैसे- रामकथा करने लगे (बगुले बनकर सिद्ध)
6, 5, 2 जैसे- चौपालें खामोश हैं (पनघट है वीरान)
छह मात्रा वाले शब्द के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।
दोहे का द्वितीय और चतुर्थ चरण-
प्रथम और तृतीय चरण की तरह ही दोहे का दूसरा और चौथा चरण भी केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं से ही शुरू होता है।दो मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण के विद्वानों ने आठ भेद बताए हैं-
2, 2, 2, 2, 3 जैसे- (झूठ मलाई खा रहा) छल के सिर पर ताज|2, 2, 2, 5 जैसे- (दिन-दिन बढ़ते जा रहे) घर में ही गद्दार|
2, 2, 4, 3 जैसे- (बरगद रोया फूटकर) घुट-घुट रोया नीम|
2, 2, 3, 4 जैसे- (मातृसदन घर पर लिखा) माँ को दिया निकाल
2, 4, 2, 3 जैसे- (दानव से बदतर हुई) अब मानव की सोच|
2, 4, 5 जैसे- (झूठे मिलकर सत्य को) कर देते लाचार|
2, 5, 4 जैसे- (सब गद्दार निकाल दो) ले संकल्प महीप|
2, 6, 3 जैसे- (मनसब की यदि आरजू) गा दरबारी राग|
दोहा के दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत दो मात्रा वाले शब्द से हो रही हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।
तीन मात्रा वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के निम्र भेद तय किए गए हैं-
3, 3, 5 जैसे- (फैला भ्रष्टाचार का) सभी ओर आतंक|3, 5, 3 जैसे- (ऊन काटकर भेड़ को) दिया दुशाला दान|
3, 3, 2, 3 जैसे- (जिसके पीछे भीड़ है) वही सफल है आज|
इसका चौथा भेद भी होता है जिसमें 3, 2, 3, 3 मात्राएँ होती हैं, किंतु बीच की मात्राएँ 2 और 3 वास्तव में पाँच मात्राओं वाले शब्द के रूप में ही प्रयोग की जाती हैं। जैसे अध जले, अन मने।
चार मात्राओं वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के चार भेद बताए गए हैं-
4, 4, 3 जैसे- (राशन मुखिया खा गया) मिटती कैसे भूख |4, 3, 4 जैसे- (भाव जमीनों के बढे) सस्ते हुए ज़मीर|
4, 2, 2, 3 जैसे- (छोड़ गया वो पूत भी) रोने को दिन-रैन|
4, 2, 5 जैसे- (बाँट दिया किसने यहाँ) नफ़रत का सामान|
चार मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में छह मात्रा वाले शब्दों का प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार चार मात्रा वाले शब्द के ठीक बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता।
छह मात्राओं से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के केवल दो ही भेद विद्वानों ने बताए हैं-
6, 2, 3 जैसे- (सन्नाटा है गाँव में) खौफज़दा हैं लोग|6, 5 जैसे- (सांप नेवलों ने किया) समझौता चुपचाप|
छह मात्राओं से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में चार मात्राओं वाले शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। इसी प्रकार छह मात्रा वाले शब्द की ठीक बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।
इसके साथ-साथ कुछ और भी नियम विद्वानों ने तय किए हैं जैसे-
1. दोहे का प्रथम और तृतीय चरण जगण अर्थात ।ऽ। मात्रा वाले शब्द से शुरू नहीं किया जा सकता। जैसे जमीन, किसान आदि शब्द।2. दूसरे चरण के अंत में चार मात्रा वाला शब्द हमेशा जगण अर्थात ।ऽ। मात्रा के रूप में ही आता है।
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए यदि दोहे की रचना की जाए तो उसके लयात्मक और धारदार होने की संभावना बढ़ जाती है।
-रघुविन्द्र यादव
Sunday, October 11, 2020
हरियाणा के समकालीन दोहाकार और उनके दोहा संग्रह
हरियाणा में रचित दोहा साहित्य
हरियाणा के दोहाकार और उनके दोहा संग्रह
हरियाणा का प्रथम दोहा संग्रह
संदर्भ सूची-
7. ‘बाबूजी का भारतमित्र’ दोहा विशेषांक (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 18
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