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Tuesday, May 20, 2025

समकालीन बहुरंगी दोहों का संकलन है : नावक के तीर

“नावक के तीर” हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 51 दोहाकारों का साझा दोहा संकलन है| जिसमें प्रत्येक दोहाकार के 15-15 दोहे सचित्र संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाशित किये गए हैं| संकलन में जहाँ वरिष्ठ दोहाकार डॉ रामनिवास ‘मानव’, घमंडीलाल अग्रवाल, मनोज ‘अबोध’, रघुविन्द्र यादव, योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’, राजपाल गुलिया, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, कमलेश व्यास ‘कमल’ आदि शामिल हैं वहीं युवा दोहाकार राहुल शिवाय, गरिमा सक्सेना, सत्यम भारती, संजय तन्हा, अनंत आलोक, अमर पाल, कुलदीप कौर ‘दीप’, धर्मपाल ‘धर्म’ आदि शामिल हैं|

इनके अलावा डॉ मधु प्रधान, सुशीला शील, हरिराम पथिक, संदीप मिश्र ‘सरस’, डॉ तुलिका सेठ, हलीम आईना, अलका शर्मा, ओंकार सिंह ‘विवेक’, सुरेश कुशवाह ‘तन्मय’, विभा राज ‘वैभवी’, संदीप सृजन, सरिता गुप्ता, सूर्य प्रकाश मिश्र, रमा प्रवीर वर्मा, डॉ मनोज कामदेव, कृष्ण सुकुमार, शीतल वाजपेयी, नीलम सिंह, डॉ फहीम अहमद, बृजराज किशोर ‘राहगीर’, वृन्दावन राय ‘सरल’, डॉ लक्ष्मी नारायण पाण्डेय, किरण प्रभा, विनयशील चतुर्वेदी, रामकिशोर सौनकिया किशोर, डॉ मानिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ गीता पाण्डेय ‘अपराजिता’, व्यग्र पाण्डेय, डॉ नूतन शर्मा ‘नवल’, प्रोमिला भारती, सुरेन्द्र कुमार सैनी, प्रबोध मिश्र ‘हितैषी’. डॉ चंद्रपाल सिंह यादव, अजय अज्ञात और मोहन द्विवेदी शामिल हैं| 

दोहकारों ने जीवन जगत से जुड़े विभिन्न विषयों यथा सामाजिक कुरीतियों, विद्रूपताओं, नैतिक पतन, स्वार्थ लोलुपता, पर्यावरण ह्रास, संवेदनहीनता, बुजुर्गों की उपेक्षा, किसानों की पीड़ा, राजनैतिक पतन, भ्रष्टाचार, दहेज़, टूटते परिवार, दरकते रिश्ते, माँ, हिंदी, नारी, बेटी, प्रकृति, संस्कृति आदि पर दोहे लिखे हैं| ये दोहे युगबोध के दोहे हैं और अपने समय से सवाल करते हैं|

अधिकाँश दोहकारों ने बिम्बों, प्रतीकों, अलंकारों, मुहावरों का प्रयोग करके अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावशाली और दमदार बनाया है| हालांकि कुछ लोग अभी भी उपदेशात्मक और धार्मिक दोहों पर ही अटके हुए हैं| यों तो इस संकलन के 80 प्रतिशत दोहे उद्दृत करने योग्य हैं, लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है| इसलिए कुछ समकालीन दोहे बानगी स्वरुप प्रस्तुत हैं-

 उन हाथों को ही मिलें, सदा जलन के घाव|

तेज हवा से दीप का, जो भी करें बचाव|| (अलका शर्मा)

सूख गई संवेदना, मरी मनों की टीस|

अब कोई रोता नहीं, एक मरे या बीस|| (डॉ रामनिवास मानव)

कहाँ सिया को ले गई, स्वर्ण हिरण की चाह|

जान रहे फिर भी नहीं, हमने बदली राह|| (राहुल शिवाय)

 आम नीम सौगान वट, नागफनी कचनार|

मिट्टी रचती ही रही, अलग-अलग किरदार|| (गरिमा सक्सेना)

 गली-गली में हो रहा, नैतिकता का खून|

पट्टी काली बाँधकर, बैठा है कानून|| (रमा प्रवीर वर्मा)

 प्रेम शब्द की वेदना, घायल मन की पीर|

या तो मीरा जानती, या फिर दास कबीर|| (मनोज अबोध)

ये रोटी को खोजता, वह सोने की खान|

अपने प्यारे देश में, दो-दो हिन्दुस्तान|| (घमंडीलाल अग्रवाल)

हेरा-फेरी ने किया, यह कैसा विध्वंस|

बगुले घुसे कतार में, मौन खड़े हैं हंस|| (प्रोमिला भारती)

 हुई अश्व-सी जिंदगी, दौड़ रहे अविराम|

चबा-चबा कर थक गए, कटती नहीं लगाम|| (राजपाल गुलिया)

जिस दिन से मेरी हुई, गर्म जरा-सी जेब|

तब से मेरे छिप गए, सारे झूठ फरेब|| (धर्मपाल धर्म)

 माली भी हैरान है, देख समय का फेर|

बरगद को बौना कहें, गमले उगे, कनेर|| (रघुविन्द्र यादव)

संकलन के अधिकांश दोहे कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से कसे हुए और परिपक्व हैं| लेकिन कुछ दोहों में छंद दोष रह गए हैं| पृष्ठ 22 पर “पल-पल गढ़ा समय तुझे” में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 37 पर “फ़ैल रहा है यह रोग” में भी मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 39 पर “फैलाये परकास” में जबरन तुक मिलाने का प्रयास किया गया है| इसी पृष्ठ पर “बिन पंखों से नाप ले, धरती अरु अस्मान” भी अशुद्ध है| पृष्ठ 42 पर “न्याय धर्म की जीत हुई” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं| पृष्ठ 45 पर “सावन भादों चेत” में भी ज़बरन तुक मिलाने का प्रयास किया गया है| पृष्ठ 46 “दुख के दरवाजे घुसे, आशाओं की बेल| लिपटे हरित बबूल से, दूध-छाँछ का खेल||” में कवि क्या कहना चाहता है स्पष्ट नहीं है| पृष्ठ 50 “इतिहास के पृष्ठ यहाँ” में चरण की शुरुआत पचकल शब्द से हो रही है, जिसके कारण लय बाधित है| पृष्ठ 52 पर “मर गया वह गरीब” में प्रारम्भिक द्विकल के बाद त्रिकल आने से लय बाधित है| इसी पृष्ठ पर “रंग-रूप से चले नहीं” में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 53 पर “पंछी खेतिहर ढोर सब” में मात्राएँ बढ़ रही हैं| पृष्ठ 54 पर “पीठ से सटा पेट” तथा “चमक बढ़ गई गाँव की” में प्रारंभिक त्रिकल के बाद द्विकल आने से लय बाधित है| पृष्ठ 79 पर “चेहरों की रेखाओं में” इस चरण में मात्राएँ बढ़ गई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 84 पर “उसी राम की रक्षा को” में भी मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा लघु नहीं है| पृष्ठ 84 पर “हृदय विवेक विहीन कवि” में लय बाधित है| पृष्ठ 85 पर “अभी उमर वारी मेरी” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 86 पर “बोला यह तो हम मेरा” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 86 पर “हो गये अरुण कपोल” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ 86 पर “खिली-खिली-सी लिली भी” में 11वीं मात्रा लघु नहीं है, जो अनिवार्य है| पृष्ठ 89 पर “करो सदा गुणगान है, बहती है रसधार” में अर्थ स्पष्ट नहीं है| पृष्ठ 89 पर ही ‘प्रवाह’ का तुकांत शब्द ‘भाव’ लिया गया है, जो अशुद्ध है| पृष्ठ 91 पर “समझ-समझ का फैर” में ज़बरन तुक मिलाने का प्रयास किया है| पृष्ठ 92 पर “गुरु कृपा इस जगत में” में मात्राएँ कम हो गई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ 92 पर ही “फाग राग संग बाजे” में 11वीं मात्रा लघु नहीं है, लय बाधित है| पृष्ठ 92 पर ही “वो रात की नींद” मात्राएँ कम हो गई हैं, छंद दोष है| पृष्ठ 97 पर अंतिम दोहे में “छाप” का तुकांत “भाँप” लिया गया है, जो अशुद्ध है| पृष्ठ 97 पर “स्वयं दौड़ती आएगी” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 102 पर “अंत समय रह जाएगा” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 105 पर “सागर में तो आयेंगे” में मात्राएँ बढ़ी हुई हैं और 11वीं मात्रा भी लघु नहीं है| पृष्ठ 106 पर “दूर रहें पर मिले ज्यों” में 11वीं मात्रा लघु नहीं है| पृष्ठ 106 पर “बुनो न सामासिक पदों, के संशय के वर्ग” में लय भंग है|

पुस्तक में प्रूफ की ढेरों अशुद्धियाँ है, जो ऐसे अखरती हैं जैसे स्वादिष्ट खीर में कंकर हों| इनके कारण भी कुछ दोहों में छंद दोष उत्पन्न हुए हैं| जैसे दिखा को देखा, दुख को दुःख, अदबी को आदबी, बढ़ा को बड़ा, जानें को जाने, आहट को आहत, शृंगार को श्रृंगार और श्रींगार, ‘को’ को के, उद्गार को उद्धार, मुझको को मूझको, मुकुलित को मुकूलित लिख दिया गया है| पृष्ठ 66 के एक दोहे से 6 मात्रा का शब्द ‘मातृसदन” ही गायब है, तो पृष्ठ 117 पर नेकी शब्द से ‘ने’ गायब है| बहुत से दोहों में या तो यति गायब है या गलत जगह लगाई हुई है| पहली भूमिका और उसमें उद्दृत किये गए दोहों में भी प्रूफ की अशुद्धियाँ हैं और दूसरी में भी|

संकलन में उपदेशात्मक दोहे भी शामिल किये गए हैं और आय, जाय, पाय, लगाय जैसे शब्दों के उपयोग वाले भी, जिनकी समकालीन दोहे में कोई जगह नहीं है| देशज और विदेशी शब्द यदि दोहे की प्रभावोत्पादकता बढ़ाते हों, तो प्रयोग करने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन अंग्रेजी के रेपिस्ट शब्द का हिंदी में बहुवचन रेपिस्टों मुझे उचित नहीं लगा|

इस 120 पृष्ठीय पेपरबैक कृति का आवरण, छपाई, प्रस्तुतिकरण और कागज़ सब स्तरीय हैं| मूल्य 250 रुपये भी वाजिब ही कहा जाएगा| कुल मिलाकर यह एक अच्छा और पठनीय दोहा संकलन है जो दोहा साहित्य को समृद्ध करेगा| अकादमी का यह एक सराहनीय प्रयास है, इससे नए दोहकारों को मंच मिला है, वहीं पाठकों को वरिष्ठ दोहकारों के भी दोहे पढ़ने को मिलेंगे|

सम्पादक सुधाकर पाठक जी और टीम को बधाई| आशा है अगला संस्करण त्रुटियों को दूर करके प्रकाशित करवाएंगे| 

रघुविन्द्र यादव 

Saturday, April 12, 2025

दोहों की परम्परा को सुदृढ़ करने वाला संग्रह : नागफनी के फूल

दोहा साहित्य की वह विधा है जिसके द्वारा कवि कम से कम शब्दों में, कम से कम समय में अधिकतम बात कहने में सफल होता है| दोहा पाठक या श्रोता की चेतना को एकदम से झकझोरता है| दोहे के अर्थ को आम बौद्धिक व्यक्ति आसानी से समझ सकते हैं| रहीम से लेकर आज तक इसकी लोकप्रियता में कहीं कोई कमी नहीं आई है| 

यदि कवि संवेदनशीलता के साथ सूक्ष्म और तटस्थ दृष्टिकोण रखते हुए विविध विषयों का समावेश कर, शब्द-शक्ति का बेहतर उपयोग करता है तो दोहा और अधिक प्रभावी बन जाता है| रघुविन्द्र यादव नयी पीढ़ी के वे दोहाकार हैं जो अपने दोहों के माध्यम से कुव्यवस्था, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण, मानवीय संबंधों की बदलती परिभाषा और आम आदमी के दुःख-दर्द को केंद्र में रखकर सशक्त तरीके से, नूतनता के साथ अपनी बात कहने में सक्षम हैं|

चित्र

कुल छह पुस्तकों का लेखन-संपादन कर चुके रघुविन्द्र यादव कि कृति "नागफनी के फूल" दोहा विधा में उनका पहला संग्रह है| जिसमें तुझ में मेरी आस्था, नागफनी के फूल, नेता लूटें देश को, भूखा रहा अवाम, भ्रष्ट व्यवस्था हो गई, दौलत की दीवार, बूँद-बूँद में ज़हर, जनभाषा हिंदी बने, वीरों का सम्मान आदि 25 शीर्षकों के अंतर्गत 424 दोहे शामिल हैं|

रघुविन्द्र यादव सहित और समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति हैं| वे सजग्त्ता से अपनी निष्ठा को न्यायप्रियता के साथ जोड़कर लेखनी के माध्यम से अपना कर्तव्य निभाने का वादा करते हैं| वे सामाजिक संरचना में आये परिवर्तन की गंभीर विवेचना करते हैं| वे जानते हैं कि मानवता की भलाई और दीर्घकालीन सुखद जीवन के लिए अच्छे लोगों का होना आवश्यक है| लेकिन कवि वर्तमान परिस्थितियों से आहत है| वह सभी से एक प्रश्न पूछते हैं| वह चाहते हैं कि सभी लोग इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ें, आत्म्विश्लेष्ण करें और सकारात्मक परिवर्तन के लिए पहल करें-

गड़बड़ मौसम से हुई, या माली से भूल|
आँगन में उगने लगे, नागफनी के फूल||

कवि आम आदमी को ही भारत की असली तस्वीर मानता है| वे शाइनिंग इंडिया के भुलावे से दूर अंतिम व्यक्ति के दुःख-दर्द को महसूस करते हैं| साम्प्रदायिकता और महँगाई से आम आदमी कितना पीड़ित है, यह कुर्सी पर बैठे सफेदपोश नहीं जानते-

भड़की नफरत की कभी, कभी पेट की आग|
दुखिया के दोनों मरे, बेटा और सुहाग||

आज भी हमारा समाज अन्धविश्वास, कुरीतियों, रूढ़ियों और पाखण्ड से ग्रस्त है| इन पर खर्च होने वाला धन अगर समाज विकास पर खर्च हो तो उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है| लेकिन दिखावे का जीवन जीने के आदि हो चुके लोग आज भी उसी पुरानी पतन की राह पर हैं| कवि का कोमल हृदय बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और तिरस्कार से भी आहत है| विभिन्न उदेश्यों को लक्षित करता उनका एक दोहा देखिये-

दो रोटी के वास्ते, मरता था जो रोज़| 
मरने पर उसके हुआ, देशी घी का भोज||

हरियाणा पूरे देश में खापों के फरमानों की वजह से चर्चा में रहता हा खाप पंचायतें समाज के सौहार्द और मनुष्य की भलाई के लिए कार्य करें तो प्रशंसनीय हैं, लेकिन अगर वे कानून अपने हाथ में लें तो वह संविधान और देश की गरिमा के खिलाफ है| सबके अपने नैतिक मानदंड हो सकते हैं, लेकिन इन्हें जाति या धर्म के नाम पर दूसरों पर थोपना तानाशही है-

गला प्यार का घोंटते, खापों के फ़रमान|
जाति धर्म के नाम पर, कुचल रहे अरमान||

वर्तमान दौर में कुर्सी की चाह इतनी प्रबल है कि हर कोई बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है-

कुर्सी खातिर लड़ रहे, सज्जन संत फ़क़ीर|
नैतिकता की राह में, घायल पड़े कबीर||

यहाँ नाम का ही लोकतंत्र है| आजादी के बाद से आज तक सत्ता चुनिन्दा हाथों में ही रही है| कवि वंशवाद की राजनीति का विरोध करता है-

भीड़तंत्र को दे दिया, लोकतंत्र का नाम|
राज खडाऊं कर रही, बदला कहाँ निज़ाम||

न्यायपालिका लोकतंत्र का मजबूत स्तम्भ होती है, लेकिन हमारी न्याय प्रणाली धीमी गति से कार्य करती है| इसलिए लोगों को समय से न्याय नहीं मिल पाता| न्याय में देरी भी अन्याय के समान है-

बूढी अम्मा मर गई, कर-कर नित फ़रियाद|
हुआ केस का फैसला, बीस बरस के बाद||

धार्मिक आस्था का दोहन आज चरम पर है| अनपढ़, ढोंगी बाबा भी दर्शन-शास्त्र की बात करते हैं और गोल-गोल घुमाते हुए सामने वाले को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं| महिलायें उनका आसान शिकार होती हैं-

सास-ससुर लाचार हैं, बहू न पूछे हाल|
डेरे में सेवा करे, बाबा हुआ निहाल||

पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्त्ता से कवि बने श्री यादव प्रकृतिवादी हैं| वे पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन को देखते-समझते हैं| एक बेहद रोचक नूतन प्रयोग के साथ वे जल की महिमा बताते हुए कहते हैं-

जल से कुछ जल बिन मरे, जल कर मरे हज़ार|
जलते को जल दे बुझा, जल जीवन का सार||

रघुविद्र यादव के दोहों में पैनापन. विविधता, नूतन प्रयोग, आम आदमी के हित में बहने वाली प्रवाहमय शैली, कलात्मकता व आशावाद है| उनके दोहों में कटु जीवन यथार्थ को, नग्न युगबोध को धारदार अभिव्यक्ति मिली है| रघुविन्द्र यादव के दोहे कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से हमें आश्वस्त करते हैं| 

पुस्तक का आवरण आकर्षक, छपाई सुंदरा और कागज़ स्तरीय है| प्रूफ की कोई अशुद्धि नज़र नहीं आती| बहर्लाक रघुविन्द्र यादव का यह दोहा संग्रह न केवल दोहा के प्रशंसकों को अपितु अन्य विधाओं के चाहने वालों को भी पसंद आएगा, ऐसी आशा है| दोहों की परम्परा को सुदृढ़ करने वाली यह पुस्तक स्वागत योग्य है|

डॉ. सुशील शीलू 
मंडलाना, नारनौल 

Monday, September 16, 2024

दुरूहता से दूर, काव्य-रस से भरपूर दोहे

दुरूहता से दूर, काव्य-रस से भरपूर दोहे

शब्द-कुठारा चल पड़ा, करने जमकर वार।
केवल शुचिता बच रहे, सुन्दर हो संसार।।

आये याद कबीर दोहाकार रघुविन्द्र यादव का तीसरा दोहा संग्रह है| कवि का आक्रोश है– व्यवस्था की कुचालों, सत्ता के दुराचरण, वैयक्तिक आडम्बरप्रियता, रिश्तों के खोखलेपन, अंधभक्ति, तथाकथित संतों की शर्मनाक करतूतों, माता-पिता के प्रति संतान के उपेक्षित व्यवहार, स्वार्थ की पराकाष्ठा, किसान-मजूर की दुर्दशा, घटते भाईचारे, मीडिया की कारगुजारी, नशाखोरी, संवेदनहीनता, कूपमण्डूकता तथा सामाजिक भेदभाव के प्रति। विसंगतियों, विद्रूपताओं को केन्द्र में रखकर कलम चलाई गई है, वहीं कवि मानव मात्र को संदेश देना नहीं भूला है। पीड़ा के इन मजमूनों में खुदा को भी नहीं बख़्शा गया–

ऊपर बैठे लिख रहा, सबके जीवन लेख।
हिम्मत है तो या खुदा, जग में आकर देख।।

जीवन है तो समस्याएँ हैं; उनके निराकरण हेतु कवि का आह्वान है–

हाथ बढाओ साथियो, मन से खौफ निकाल।
आओ सत्ता से करें, खुलकर रोज़ सवाल।।

संग्रह के अनेक दोहे कालजयी कोटि के हैं, यथा –

कुत्ता बेशक भौंक ले, कितनी ऊँची टेर।
वही रहेगा उम्र भर, नहीं बनेगा शेर।।

दौलत देती है कहाँ, कभी किसी का साथ। 
सभी सिकंदर लौटते, जग से खाली हाथ।।
 
छंद तपस्या माँगते, यादव रखना याद।
बिना तपे बनता नहीं, लोहा भी फौलाद।।

दिन-दिन बिगड़ते माहौल को देखकर कवि चेताता है-

गलत-सही का फैसला, अगर करेगी भीड़।
भाईचारा छोड़िये, नहीं बचेंगे नीड़।।

आमजन को सचेत किया है कि कुपात्र को सत्ता सौंपने से बचें अन्यथा–

झूठों को सत्ता मिले, भांड़ों को सम्मान।
हिस्से में ईमान के, तपता रेगिस्तान।।

दोहाकार की प्रश्नाकुलता साझी प्रश्नाकुलता हो जाती है जब वे कहते हैं–

भूखा है हर आदमी, सबके लब पर प्यास।
सरकारें करती रहीं, जाने कहाँ विकास।।

पाठक की अंतश्चेतना को झकझोरता एक अन्य उदाहरण है–

हिम्मत टूटी हंस की, डोल गया विश्वास।
काग मिले जब मंच पर, पहने धवल लिबास।।

भाव-गहनता के आधार पर मैं इस दोहे को सबसे ऊपर रखती हूँ–

जीवन भर लड़ता रहा, मैं औरों से युद्ध।
वो खुद से लड़कर हुआ, पल भर में ही बुद्ध।।

भाव व कला की उत्कृष्टता का नमूना देखिए–

कनक खेत में खप गई, सस्ती बिकी कपास।
रामदीन रुखसत हुआ, खा गोली सल्फास।।

कवि की व्यंजना-क्षमता को प्रमाणित करता है यह दोहा–

कितने दर्द अभाव हैं, झोपड़ियों के पास।
फिर भी महलों की तरह, रहती नहीं उदास।।

कवि पुन: पुन: सत्ता के स्वभाव पर चुटकी लेता नहीं थकता–

सत्ता ने अब कर लिए, आँख, कान सब बंद।
उसको शब्द विरोध के, बिलकुल नहीं पसंद।।

प्रतीक शैली, विरोधाभास अलंकार तथा कटूक्तियों का खुलकर प्रयोग किया गया है, प्रत्येक का एक-एक उदाहरण पेश है–

सूरज की पेशी लगी, जुगनू के दरबार।
हुई गवाही रात की, दोषी दिया करार।।

खुद को अब हीरा कहो, बढ़-चढ़ बोलो बोल।
जितना बढ़िया झूठ है, उतना ऊँचा मोल।।

भात-भात करते मरी, भारत की संतान।
शासक गंगा गाय की, छेड़ रहे हैं तान।।

दोहों में लयात्मकता, गेयता, ध्वन्यात्मकता के गुण विद्यमान हैं। कला पक्ष, भाव-पक्षपर खरे उतरते हैं ये दोहे। संग्रह का मुखपृष्ठ अर्थपूर्ण व मूल्य वाज़िब है। दोहाकार ने आत्मकथ्य में अपने दोहों की चोरी की बात लिखी है। देखिए न, मोतियों के सामने कंकरों की क्या बिसात? चोरी करनी ही है तो यूनीक की करे। मेरे कथन का अर्थ चौर्य-कर्म को मान्यता देने से नहीं, कवि के रचना-कौशल से है। साहित्यिक गलियारों में प्राय: पाठकों की कमी का रोना रोया जाता है। मेरे मतानुसार लेखन में दम हो तो पाठकों की कमी नहीं। वस्तुत: यही है लेखन की सार्थकता और कवि/लेखक की सफलता। कवि की इस चाहना से भला कौन सहमत नहीं होगा–

पढ़ पायेंगे क्या कभी, ऐसा भी अख़बार।
जिसमें केवल हो लिखा, प्यार, प्यार बस प्यार।।

रघुविन्द्र यादव डंके की चोट पर नाद करते हैं–

बेशक जाए जान भी, सत्य लिखूँगा नित्य।
क्या है बिना ज़मीर के, जीने का औचित्य?

कामना है, कवि का यह हौंसला नित नई बुलंदी पाता रहे। संग्रह के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएँ।

-कृष्णलता यादव
गुरुग्राम 122001

कबीराना अंदाज़ के दोहे : आये याद कबीर

कबीराना अंदाज़ के दोहे : आये याद कबीर

अर्द्धसम मात्रिक छंद दोहा बेहद प्राचीन सनातनी छंद रहा है। समय,काल और परिस्थितियों के साथ इसका कथ्य भले ही बदला हो, किंतु इसका मानक शास्त्रीय पक्ष एवं शिल्प ज्यों का त्यों रहा है। भक्ति काल,रीति काल तथा आधुनिक काल के दोहों का अपना-अपना महत्व है। अनेक संत कवियों को उनके दोहों की रचनाधर्मिता ही अमर कर गई। 
 
अपनी संक्षिप्तता,गागर में सागर, वक्रता, मारक क्षमता तथा कहन के अंदाज़ के चलते दोहे का जादू हर काल में सिर चढ़कर बोलता रहा है। यदि दोहे में से उपरोक्त घटकों को निकाल दिया जाए तो तेरह ग्यारह मात्राओं की इस सपाटबयानी को महज़ तुकबंदी ही कहा जाएगा।

समीक्ष्य कृति 'आये याद कबीर' दोहा के पर्याय कहे जाने वाले रचनाकार रघुविंद्र यादव का तीसरा दोहा संग्रह है,जिसमें मानक दोहा प्रारूप के तमाम मूलपक्ष देखे जा सकते हैं। कबीराना अंदाज,तल्ख मिजाज तथा विरोध की जनपक्षीय आवाज इस संग्रह की समग्र रचनाधर्मिता कि केंद्र में निहित है। 

दोहाकार सामाजिक विसंगतियों तथा विद्रूपताओं चित्रणभर ही नहीं करता, यथोचित शाब्दिक लताड़ भी मारता है। कुछ बानगियांँ देखिएगा-

पीट रहे हैं लीक को, नहीं समझते मर्म।
आडंबर को कह रहे, कुछ नालायक धर्म।।

गिरवी दिनकर की कलम,पढ़ें कसीदे मीर।
सुख-सुविधा की हाट में, बिकते रोज कबीर।।

ज्ञानी-ध्यानी मौन हैं,मूढ़ बांँटते ज्ञान।
पाखंडों के दौर है,सिर धुनता विज्ञान।।

संग्रह के तमाम दोहे व्यवस्था तथा सामाजिक दोगलेपन पर करारी चोट करते हैं। संग्रह में प्रतीकों का सहज समावेश प्रभाव छोड़ता है-

ख़ूब किया सय्याद ने, बुलबुल पर उपकार।
पंख काट कर दे दिया, उड़ने का अधिकार।।

हिम्मत टूटी हंस की, डोल गया विश्वास।
काग मिले जब मंच पर, पहने धवल लिबास।।

झूठ युधिष्ठिर बोलते, करण लूटते माल।
विदुर फिरौती ले रहे, केशव करें मलाल।।

विरोध के मूल स्वर में पगे इन दोहों से के माध्यम से सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में निरंतर हो रहे अवमूल्यन को सहज ही समझा जा सकता है-

नैतिकता ईमान से, वक्त गया है रूठ।
सनद मांगता सत्य से, कुर्सी चढ़कर झूठ।।

कहांँ रहेंगे मछलियांँ, सबसे बड़ा सवाल।
घड़ियालों ने कर लिए, कब्जे में सब ताल।।
 
विषय-विविधता, कलात्मक आवरण,सुंदर छपाई संग्रह की अतिरिक्त खूबियां हैं|
 
-सत्यवीर नाहड़िया