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Monday, September 16, 2024

आओ दोहा लिखें

दोहा कैसे लिखें  

दोहा लिखने के नियम 

दोहा लिखने के लिए मात्राओं की गिनती कैसे करें 

दोहे का व्याकरण

आज दोहा लोकप्रियता के शिखर पर, इसलिए हर रचनाकार चाहता है कि वह भी दोहे लिखे| किन्तु दोहा जितना छोटा और सीधा दिखता है लिखना उतना सरल नहीं है| परिणामस्वरूप बहुत कम लोग ही मानक दोहे लिख पाते हैं| क्योंकि-
दीरघ दोहा अर्थ के, आखर थोरे आहि|
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिट कूद चलि जाहि||

अर्थात दोहे में अक्षर भले ही कम होते हैं, लेकिन उसे दीर्घ अर्थ वाला होना चाहिए और दोहाकार को नट की भांति कुशल होना चाहिए| जैसे एक नट अपने सारे शरीर को साध कर कुंडली में से निकाल देता है वैसे ही दोहाकार को भी दोहा रचने में सक्षम होना चाहिए|

दो पंक्तियों और चार चरणों में 13-11, 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राओं से लिखा जाने वाला छंद दोहा कहलाता है। इससे कम या अधिक मात्राओं वाली रचना मानक दोहा की श्रेणी में नहीं आती। मात्राओं के अलावा दोहे का कथ्य, शिल्प, भाव और भाषा भी प्रभावशाली हो।

आधुनिक दोहा को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक योगदान करने वाले आचार्य देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के अनुसार-''दोहा छंद की दृष्टि से एकदम चुस्त-दुरुस्त और निर्दोष हो। कथ्य सपाट बयानी से मुक्त हो। भाषा चित्रमयी और संगीतात्मक हो। बिंब और प्रतीकों का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में हो। दोहे का कथ्य समकालीन और आधुनिक बोध से संपन्न हो। उपदेशात्मक नीरसता और नारेबाजी की फूहड़ता से मुक्त हो।"

डॉ. अनंतराम मिश्र ‘अनंत’ ‘दोहे की आत्मकथा’ में लिखते हैं- ''भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण और रस मेरी आत्मा है। कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा हृदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है। प्रथम-तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय-चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं।"

आशय यह कि प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 और दूसरे तथा चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ जोड़ लेने भर से दोहा नहीं बन जाता। इसके लिए और भी बहुत कुछ चाहिए। दोहे के प्रथम और तृतीय चरण का समापन लघु गुरु या तीन लघु से होना अनिवार्य है। इसी प्रकार दोहा के दूसरे और चौथे चरण का अंत गुरु लघु से होना अनिवार्य है।

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है, इसलिए सबसे पहले मात्राओं की गणना का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। जब तक मात्राओं की गणना का सही ज्ञान नहीं होगा मानक दोहा नहीं लिखा जा सकता। दोहे के व्याकरण पर यूँ तो विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है| ‘छंद प्रभाकर’ से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक इस छंद की जानकारी मिलती है| किन्तु नए रचनाकारों की सुविधा के लिए यहाँ मात्राओं की गणना से लेकर दोहे की रचना तक की जानकारी सरल भाषा में देने का प्रयास किया जा रहा है|

मात्राओं की गणना निम्रप्रकार की जाती है-

 हिन्दी भाषा के सभी व्यंजनों की एक मात्रा (।) मानी जाती है। लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ की भी (।) मात्रा ही मानी जाती हैं। जबकी दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ ओ और औ की मात्राएँ दीर्घ (ऽ) मानी जाती हैं। व्यंजनों पर लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ आ रहे हों तो भी मात्रा लघु (।) ही रहेगी। किंतु यदि दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राएँ आ रही हों तो मात्रा दीर्घ (ऽ) हो जाती है।

अर्ध-व्यंजन और अनुस्वार/बिंदु (.)की आधी मात्रा मानी जाती है। मगर आधी मात्रा की स्वतंत्र गणना नहीं की जाती। यदि अनुस्वार अ, इ, उ अथवा किसी व्यंजन के ऊपर प्रयोग किया जाता है तो मात्राओं की गिनती करते समय दीर्घ मात्रा मानी जाती है किन्तु स्वरों की मात्रा का प्रयोग होने पर अनुस्वार (.) की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती।

आधे अक्षर की स्वतंत्र गिनती नहीं की जाती बल्कि अर्ध-अक्षर के पूर्ववर्ती अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती है। यदि पूर्ववर्ती व्यंजन पहले से ही दीर्घ न हो अर्थात उस पर पहले से कोई दीर्घ मात्रा न हो। उदाहरण के लिए अंत, पंथ, छंद, कंस में अं, पं, छं, कं सभी की दो मात्राए गिनी जायेंगी इसी प्रकार शब्द, वक्त, कुत्ता, दिल्ली इत्यादि की मात्राओं की गिनती करते समय श, व, क तथा दि की दो-दो मात्राएँ गिनी जाएँगी। इसी प्रकार शब्द के प्रारंभ मेें आने वाले अर्ध-अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती जैसे स्वर्ण, प्यार, त्याग आदि शब्दों में स्, प् और त् की गिनती नहीं की जाएगी। प्रारम्भ में संयुक्त व्यंजन आने पर उसकी एक ही मात्रा गिनी जाती है। जैसे श्रम, भ्रम, प्रभु, मृग। इन शब्दों मेें श्र, भ्र, प्र तथा मृ की एक ही मात्रा गिनी जाएगी।

अनुनासिक/चन्द्र बिन्दु की कोई गिनती नहीं की जाती। जैसे- हँस, हँसना, आँख, पाँखी, चाँदी आदि शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग होने के कारण इनकी कोई मात्रा नहीं मानी जाती।

नोट:- दोहे में मात्रा गिराने का कोई प्रावधान नहीं है| हालांकि "और" के स्थान पर (औ') का प्रयोग किया जाता है| इसी प्रकार "दुःख" को (दुख) लिखकर दो मात्रा के रूप में प्रयोग किया जाता है|  

दोहा यदि लयात्मक है तो उसमें छंद दोष होने की सम्भावना न के बराबर होती है| किन्तु जिन लोगों को संगीत का ज्ञान नहीं है उनके लिए इसे तय करना मुश्किल होता है, इसलिए कौन से चरण में क्या होना चाहिए और क्या वर्जित है उसकी चर्चा करते हैं-

दोहे का प्रथम और तृतीय चरण-

दोहा लयबद्ध रहे इसके लिए इसे केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं वाले शब्दों से ही शुरू किया जाता है, पाँच मात्राओं वाले शब्द से दोहा का कोई चरण शुरू नहीं किया जाता। प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के मात्रिक गणों के हिसाब से कुल 34 भेद छंद विशेषज्ञों ने तय किए हैं। इसी प्रकार दूसरे और चौथे चरण के लिए 18 भेद तय किए हैं। जिनका क्रमवार विवरण निम्रांकित है-

दो मात्राओं से दोहा शुरू करने के विद्वानों ने मात्रिक गणों के अनुसार 12 भेद बताए हैं-

2, 2, 2, 2, 2, 3 जैसे- दुख-सुख में जो सम रहे (होता सच्चा संत)
2, 2, 2, 2, 3, 2 जैसे- अब तक भी है गाँव में (कष्टों की भरमार)
2, 2, 2, 4, 3 जैसे- घर तो अब सपना हुआ (महंगी रोटी दाल)
2, 2, 4, 2, 3 जैसे- दिन-दिन बढ़ते जा रहे (झूठ और पाखंड)
2, 4, 2, 3, 2 जैसे- इक मानव की भूख है (इक सागर की प्यास)
2, 4, 2, 5 जैसे- धन-दौलत को मानते (जो अपना भगवान्)
2, 2, 4, 5 जैसे- घर की खातिर चाहिए (त्याग समर्पण प्यार)
2, 2, 4, 3, 2 जैसे- धन की अंधी दौड़ में (दौड़ रहे हैं लोग)
2, 5, 4, 2, जैसे- सब गद्दार निकाल दो (ले संकल्प महीप)
2, 6, 3, 2 जैसे- माँ सुलझाती गाँठ सब (पथ करती आसान)
2, 2, 6, 3 जैसे- नख भी कटवाया कभी (आता है क्या याद)
2, 6, 2, 3 जैसे- पढ़ पायेंगे क्या कभी (ऐसा भी अखबार)
दो मात्रा से प्रारम्भ होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में शुरू में दो मात्रा के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार प्रारंभ में दो के बाद चार मात्रा आने पर तीन मात्रा नहीं आती। साथ ही शुरू में तीन बार दो-दो मात्रा वाले शब्द आ रहे हों तो उनके बाद भी तीन मात्रा नहीं आती। प्रारंभ में दो मात्रा के बाद छह मात्रा आने पर उसके बाद चार मात्रा नहीं आती।

तीन मात्राओं से प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के आठ भेद बताए गए हैं-

3, 3, 2, 3, 2 जैसे- सजे हुए हैं ताज में (बिन खुशबू के फूल)
3, 3, 2, 2, 3 जैसे- प्यार दिनों दिन बढ़ रहा (यूं यारों के बीच)
3, 3, 2, 5 जैसे- निकल पड़ा जो ढूँढने (पाई उसने राह)
3, 5, 5, जैसे- बम्ब, धमाके, गोलियां (खून सने अखबार)
3, 5, 2, 3 जैसे- कोख किराये पर चढ़ी (ममता हुयी नीलाम)
3, 3, 4, 3 जैसे- नया दौर रचने लगा (नए-नए प्रतिमान)
3, 5, 3, 2 जैसे- एक अकेली जान अब (चारों पर है भार)
3, 3, 5, 2 सास-ससुर लाचार हैं (बहू न पूछे हाल)
शुरू में तीन मात्रा शब्द के बाद दो, चार और छह मात्रा वाले शब्द नहीं आते। इसी प्रकार शुरू में तीन के बाद पाँच मात्रा हों तो उसके बाद चार मात्रा वाला शब्द नहीं आएगा।

चार मात्राओं से दोहे का प्रथम और तृतीय चरण शुरू करने के 10 भेद विद्वानों द्वारा बताए गए हैं-

4, 4, 3, 2 जैसे- मंदिर मस्जिद चर्च में (हुआ नहीं टकराव)
4, 4, 2, 3 जैसे- देवी कहता है जिसे (रहा गर्भ में मार)
4, 4, 5 जैसे- गाड़ी, बँगले, चेलियाँ (अरबों की जागीर)
4, 2, 4, 3 जैसे- चंदन वन गायब हुआ (उगने लगे बबूल)
4, 2, 2, 2, 3 जैसे- गाँवों में भी आ गया (शहरों वाला रोग)
4, 2, 2, 3, 2 जैसे- मरना है हर हाल में (सुन ले अरे किसान)
4, 2, 2, 5 जैसे- लिखने का क्या फायदा (कलम अगर लाचार)
4, 3, 3, 3 जैसे- अच्छा हुआ न मिल सके (गंजों को नाखून)
4, 2, 5, 2 जैसे- दोनों दल खुशहाल हैं (करता देश विलाप)
4, 3, 4, 2 जैसे- देने लगा समाज भी (पैसे को अधिमान)
चार मात्रा से शुरू होने वाले प्रथम और तृतीय चरण में प्रारंभिक चार के बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता। इसी प्रकार यदि चार मात्रा वाले शब्द के बाद दो मात्रा वाला शब्द आ रहा हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

छह मात्राओं वाले शब्द से दोहे के प्रथम और तृतीय चरण की शुरूआत करने के चार भेद होते हैं-

6, 2, 2, 3 जैसे- चौराहों पर लुट रही (अबलाओं की लाज)
6, 2, 3, 2 जैसे- सुविधाओं की चाह में (बिकता है ईमान)
6, 4, 3 जैसे- रामकथा करने लगे (बगुले बनकर सिद्ध)
6, 5, 2 जैसे- चौपालें खामोश हैं (पनघट है वीरान)
छह मात्रा वाले शब्द के बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

दोहे का द्वितीय और चतुर्थ चरण-

प्रथम और तृतीय चरण की तरह ही दोहे का दूसरा और चौथा चरण भी केवल दो, तीन, चार और छह मात्राओं से ही शुरू होता है। 

दो मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण के विद्वानों ने आठ भेद बताए हैं-

2, 2, 2, 2, 3 जैसे- (झूठ मलाई खा रहा) छल के सिर पर ताज|
2, 2, 2, 5 जैसे- (दिन-दिन बढ़ते जा रहे) घर में ही गद्दार|
2, 2, 4, 3 जैसे- (बरगद रोया फूटकर) घुट-घुट रोया नीम|
2, 2, 3, 4 जैसे- (मातृसदन घर पर लिखा) माँ को दिया निकाल
2, 4, 2, 3 जैसे- (दानव से बदतर हुई) अब मानव की सोच|
2, 4, 5 जैसे- (झूठे मिलकर सत्य को) कर देते लाचार|
2, 5, 4 जैसे- (सब गद्दार निकाल दो) ले संकल्प महीप|
2, 6, 3 जैसे- (मनसब की यदि आरजू) गा दरबारी राग|
दोहा के दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत दो मात्रा वाले शब्द से हो रही हो तो उसके बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

तीन मात्रा वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के निम्र भेद तय किए गए हैं-

3, 3, 5 जैसे- (फैला भ्रष्टाचार का) सभी ओर आतंक|
3, 5, 3 जैसे- (ऊन काटकर भेड़ को) दिया दुशाला दान|
3, 3, 2, 3 जैसे- (जिसके पीछे भीड़ है) वही सफल है आज|
इसका चौथा भेद भी होता है जिसमें 3, 2, 3, 3 मात्राएँ होती हैं, किंतु बीच की मात्राएँ 2 और 3 वास्तव में पाँच मात्राओं वाले शब्द के रूप में ही प्रयोग की जाती हैं। जैसे अध जले, अन मने।
तीन मात्रा से शुरू हो रहे दूसरे और चौथे चरण में प्रारंभिक तीन मात्रा वाले शब्द के बाद दो मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

चार मात्राओं वाले शब्द से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के चार भेद बताए गए हैं-

4, 4, 3 जैसे- (राशन मुखिया खा गया) मिटती कैसे भूख |
4, 3, 4 जैसे- (भाव जमीनों के बढे) सस्ते हुए ज़मीर|
4, 2, 2, 3 जैसे- (छोड़ गया वो पूत भी) रोने को दिन-रैन|
4, 2, 5 जैसे- (बाँट दिया किसने यहाँ) नफ़रत का सामान|
चार मात्रा से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में छह मात्रा वाले शब्दों का प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार चार मात्रा वाले शब्द के ठीक बाद पाँच मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

छह मात्राओं से दूसरे और चौथे चरण की शुरूआत के केवल दो ही भेद विद्वानों ने बताए हैं-

6, 2, 3 जैसे- (सन्नाटा है गाँव में) खौफज़दा हैं लोग|
6, 5 जैसे- (सांप नेवलों ने किया) समझौता चुपचाप|

छह मात्राओं से शुरू होने वाले दूसरे और चौथे चरण में चार मात्राओं वाले शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। इसी प्रकार छह मात्रा वाले शब्द की ठीक बाद तीन मात्रा वाला शब्द नहीं आता।

इसके साथ-साथ कुछ और भी नियम विद्वानों ने तय किए हैं जैसे-

1. दोहे का प्रथम और तृतीय चरण जगण अर्थात ।ऽ। मात्रा वाले शब्द से शुरू नहीं किया जा सकता। जैसे जमीन, किसान आदि शब्द।
2. दूसरे चरण के अंत में चार मात्रा वाला शब्द हमेशा जगण अर्थात ।ऽ। मात्रा के रूप में ही आता है।

उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए यदि दोहे की रचना की जाए तो उसके लयात्मक और धारदार होने की संभावना बढ़ जाती है।

-रघुविन्द्र यादव

Sunday, October 11, 2020

हरियाणा के समकालीन दोहाकार और उनके दोहा संग्रह

हरियाणा में रचित दोहा साहित्य 

हरियाणा के दोहाकार और उनके दोहा संग्रह 

हरियाणा का प्रथम दोहा संग्रह

अर्द्धसम मात्रिक छंद दोहा भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित और लोकप्रिय रहा है| संस्कृत में इसे ‘दोग्धक’ कहा जाता था| जिसका अर्थ है- जो श्रोता या पाठक के मन का दोहन करे| इसे दोहक, दूहा, दोहरा, दोहड़ा, दोहयं, दोहउ, दुवह और दोहअ भी कहा जाता रहा है, लेकिन अब यह दोहा के नाम से ही लोकप्रिय है| 

वह लयात्मक काव्य रचना जो 13-11, 13-11 के क्रम में दो पंक्तियों और चार चरणों में कुल 48 मात्राओं के योग से बनी हो, जिसके प्रथम और तृतीय चरणों का अंत लघु-गुरु से तथा दूसरे और चैथे चरणों का अंत गुरु-लघु से होता हो और जो पाठक या श्रोता के मन मस्तिष्क पर अपना प्रभाव छोड़ सके, दोहा कहलाती है। 

मात्राओं के अलावा दोहे का कथ्य और भाषा भी समकालीन और प्रभावशाली हो| किसी भी चरण का आरम्भ पचकल और जगण शब्द से न हो| यदि कोई रचना ये शर्तें पूरी करती है तभी उसे ‘मानक दोहा’ माना जाता है| 

दोहा छ्न्द सदियों लम्बी यात्रा तय करके आज नया दोहा अथवा आधुनिक दोहा बन चुका है। जिस प्रकार भाषाओं का क्रमिक विकास होता है उसी प्रकार साहित्य की विधाओं का विकास भी क्रमिक रूप से ही होता है। इसकी कोई निश्चित अवधि नहीं होती। दोहा छंद के नया दोहा बनने की भी कोई अवधि निश्चित नहीं है। हाँ इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नया दोहा बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में फला-फूला। हालांकि इसकी नींव पहले ही रखी जा चुकी थी। मैथिलिशरण गुप्त जी का यह दोहा इस तथ्य की पुष्टि करता है- 

अरी! सुरभि जा, लौट जा, अपने अंग सहेज। 
तू है फूलों की पली, यह काँटों की सेज।।1 

    नया दोहा को लोकप्रिय बनाने में सर्वाधिक महत्तवपूर्ण भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ नवगीतकार और दोहाकार देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी के अनुसार “नयी कहानी, नयी कविता, नयी समीक्षा की भांति गीत भी नवगीत के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब हुआ तो ग़ज़ल भी नयी ग़ज़ल हो गई और दोहा भी नये दोहे के रूप में जाना जाने लगा।”2 

    विभिन्न विद्वानों ने समकालीन दोहा को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है| प्रोफेसर देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ दोहे की विशेषता कुछ यूँ बताते हैं- “दोहा छंद की दृष्टि से एकदम चुस्त-दुरुस्त और निर्दोष हो| कथ्य सपाट बयानी से मुक्त हो| भाषा चित्रमयी और संगीतात्मक हो बिम्ब और प्रतीकों का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में हो| दोहे का कथ्य समकालीन और आधुनिक बोध से सम्पन्न हो| उपदेशात्मक नीरसता और नारेबाजी की फूहड़ता से मुक्त हो|”3 

    डॉ. अनंतराम मिश्र ‘अनंत’ दोहे की आत्मकथा में लिखते हैं- “भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण, और रस मेरी आत्मा है| कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा हृदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है| प्रथम और तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय और चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं|”4 

    श्री जय चक्रवर्ती समकालीन दोहे को परिभाषित करते हुए कहते हैं- “समकालीन दोहे का वैशिष्टय यह है कि इसमें हमारे समय की परिस्थितियों, जीवन संघर्षों, विसंगतियों, दुखों, अभावों और उनसे उपजी आम आदमी की पीड़ा, आक्रोश, क्षोभ के सशक्त स्वर की उपस्थिति प्रदर्शित होने के साथ-साथ मुक्ति के मार्ग की संभावनाएं भी दिखाई दें|”5 

    श्री हरेराम समीप परम्परागत और आधुनिक दोहे का भेद स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “परम्परागत दोहों से आधुनिक दोहा का सौन्दर्यबोध स्वाभाविक रूप से बदला है| अध्यात्म, भक्ति और नीतिपरक दोहों के स्थान पर अब वह उस आम-जन का चित्रण करता है, जो उपेक्षित है, पीड़ित है, शोषित है और संघर्षरत है| इस समूह के दोहे अपने नए अंदाज़ में तीव्र और आक्रामक तेवर लिए हुए हैं| अत: जो भिन्नता है वह समय सापेक्ष है| इसमें आस्वाद का अन्तर प्रमुखता से उभरा है| इन दोहों में आज का युगसत्य और युगबोध पूरी तरह प्रतिबिंबित होता है|”6 

    डॉ.राधेश्याम शुक्ल के अनुसार, “आज के दोहे पुरानी पीढ़ी से कई संदर्भों, अर्थों आदि में विशिष्ट हैं| इनमे भक्तिकालीन उपदेश, पारम्परिक रूढ़ियाँ और नैतिक शिक्षाएँ नहीं हैं, न ही रीतिकाल की तरह श्रृंगार| अभिधा से तो ये बहुत परहेज करते हैं| ये दोहे तो अपने समय की तकरीर हैं| युगीन अमानुषी भावनाओं, व्यवहारों और परिस्थितियों के प्रति इनमें जुझारू आक्रोश है, प्रतिकार है, प्रतिवाद है|”7 

    समकालीन दोहा देश-विदेश के साथ-साथ हरियाणा में भी बड़े पैमाने पर लिखा जा रहा है| असल में हरियाणा की दोहा यात्रा भी लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी आधुनिक दोहा या नया दोहा की| प्रोफ. देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ ने जब सप्तपदी श्रृंखला का सम्पादन किया तो उसमें हरियाणा के श्री पाल भसीन, श्री कुमार रविन्द्र और डॉ. राधेश्याम शुक्ल जैसे कई कवियों के दोहे भी संकलित हुए| बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हरियाणा के दोहकारों के एकल संग्रह भी प्रकशित होने शुरू हो गए थे| सबसे पहले पाल भसीन का ‘अमलतास की छाँव’ 1994 में प्रकाशित हुआ, इसके बाद सारस्वत मोहन मनीषी का ‘मनीषी सतसई’ 1996, रक्षा शर्मा ‘कमल’ का ‘दोहा सतसई’ 1998 और ‘रक्षा-दोहा-कोश’ 1999 में प्रकशित हुआ| रामनिवास मानव का बोलो मेरे राम 1999 में, हरेराम समीप का ‘जैसे’ और अमरीक सिंह का ‘दोहा के जाम, नेताओं के नाम’ 2000 में प्रकाशित हो चुके थे| 

    इक्कीसवीं सदी के आते-आते दोहा काफी लोकप्रिय हो चुका था और पिछले दो दशक में बड़ी संख्या में दोहे रचे गए हैं| अब तक हरियाणा में लगभग चार दर्जन दोहकारों के एकल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| जिनमें पाल भसीन के ‘अमलतास की छाँव’ और ‘जोग लिखी’, सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ के ‘मनीषी सतसई’, ‘सारस्वत सतसई’ और ‘मोहन सतसई’, रक्षा शर्मा ‘कमल’ के ‘दोहा सतसई’ और ‘रक्षा दोहा-कोश’, रामनिवास मानव के ‘बोलो मेरे राम’ और ‘सहमी-सहमी आग’, हरेराम समीप के ‘जैसे’, ‘साथ चलेगा कौन’ ‘चलो एक चिट्ठी लिखे’ और ‘पानी जैसा रंग’, अमरीक सिंह का ‘दोहा के जाम-नेताओं के नाम’, योगेन्द्र मौदगिल का ‘देश का क्या होगा’, नरेन्द्र आहूजा ‘विवेक’ का ‘विवेक-दोहावली’, महेंद्र शर्मा ‘सूर्य’ का ‘संस्कृति सूर्य-सतसई’, उदयभानु हंस का ‘दोहा-सप्तशती’, मेजर शक्तिराज शर्मा का ‘शक्ति सतसई’, सतपाल सिंह चौहान ‘भारत’ के ‘भारत दोहावली भाग-1’ और ‘भारत दोहावली भाग-2’, हरिसिंह शास्त्री का ‘हरि-सतसई’, रामनिवास बंसल का ‘शिक्षक दोहावली’, ए.बी. भारती का ‘प्रारम्भ दोहावली’, गुलशन मदान का ‘लाख टके की बात’, घमंडीलाल अग्रवाल का ‘चुप्पी की पाजेब’, राधेश्याम शुक्ल का ‘दरपन वक़्त के’, रोहित यादव के ‘जलता हुआ चिराग’ और उम्र गुजारी आस में’ रघुविन्द्र यादव के ‘नागफनी के फूल’, ‘वक़्त करेगा फैसला’ और ‘आये याद कबीर’, प्रद्युम्न भल्ला का ‘उमड़ा सागर प्रेम का’, कृष्णलता यादव का ‘मन में खिला वसंत’, पी.डी. निर्मल का ‘निर्मल सतसई’, आशा खत्री का ‘लहरों का आलाप’, महेंद्र जैन का ‘आएगा मधुमास’, सत्यवीर नाहडिया का ‘रचा नया इतिहास’, मास्टर रामअवतार का ‘अवतार दोहावली’, नन्दलाल नियारा का ‘नियारा परिदर्शन’, राजपाल सिंह गुलिया का ‘उठने लगे सवाल’, ज्ञान प्रकाश पीयूष का ‘पीयूष सतसई’, डॉ.बलदेव वंशी का ‘दुख का नाम कबीर’, शारदा मित्तल का ‘मनुआ भयो फ़कीर’, अमर साहनी का ‘दूसरा कबीर’, सुशीला शिवराण का ‘देह जुलाहा हो गई’, उषा सेठी का ‘मरिहि मृगी हर बार’ आदि शामिल हैं| 

    हरियाणा में ऐसे बहुत से दोहाकार हैं जिनके संग्रह अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन उनके दोहे पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित होते रहे हैं| इनमें कुमार रविन्द्र, दरवेश भारती, गिरिराजशरण अग्रवाल, सत्यवीर मानव, रमाकांत शर्मा, सत्यवान सौरभ, बेगराज कलवांसिया, विकास रोहिल्ला ‘प्रीत’, नीरज शर्मा, रमेश सिद्धार्थ, अनुपिन्द्र सिंह ‘अनूप’, आशुतोष गर्ग, शील कौशिक, अंजू दुआ जैमिनी, आचार्य प्रकाशचन्द्र फुलेरिया, स्वदेश चरौरा, कपूर चतुरपाठी, प्रदीप पराग, रमन शर्मा आदि शामिल हैं| 

    नए-पुराने कुछ और लोग भी दोहा छंद की साधना में लगे हुए हैं, जिनमें मदनलाल वर्मा, पुरुषोत्तम पुष्प, कमला देवी, सुरेश मक्कड़, लोक सेतिया, देवकीनंदन सैनी, अजय अज्ञात, सत्यप्रकाश ‘स्वतंत्र’, संजय तन्हा, बाबूलाल तोंदवाल, शिवदत्त शर्मा, श्रीभगवान बव्वा, सुरेखा यादव, राममेहर ‘कमेरा’ सतीश कुमार और अंजलि सिफर आदि शामिल हैं| 

    उपरोक्त संग्रहों के अलावा हरियाणा से प्रकाशित होने वाली विभिन्न पत्रिकाओं यथा- हरिगंधा, बाबूजी का भारतमित्र, शोध दिशा आदि ने दोहा विशेषांक भी प्रकाशित किये हैं| 

    हरियाणा से ही कुछ साझा दोहा संकलनों का भी प्रकाशन हुआ है| जिनमें आधी आबादी के दोहे, आधुनिक दोहा, दोहे मेरी पसंद के और दोहों में नारी (सभी के संपादक रघुविन्द्र यादव), समकालीन दोहा कोश (हरेराम समीप) प्रमुख हैं| 

    हिंदी दोहा के अलावा हरियाणा में हरियाणवी बोली में भी दोहे रचे जा रहे हैं और अब तक आधा दर्जन से अधिक दोहकारों के एकल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| जिनमें लक्ष्मण सिंह का हरयाणवी दोहा-सतसई, रामकुमार आत्रेय का सच्चाई कड़वी घणी, श्याम सखा श्याम का औरत बेद पांचमा, हरिकृष्ण द्विवेदी के बोल बखत के, मसाल और पनघट, सारस्वत मोहन मनीषी के मरजीवन सतसई और सरजीवन सतसई, सत्यवीर नाहडिया के गाऊं गोबिंद गीत और बखत-बखत की बात शामिल हैं| संभव है कुछ और दोहाकार भी हरियाणवी दोहे लिख रहे हों, लेकिन अभी तक प्रकाश में नहीं आये हैं| 

    हरियाणा में समकालीन दोहा का बिरवा रोपने और उसे पल्लवित-पोषित करने में निसंदेह पाल भसीन, कुमार रविन्द्र, राधेश्याम शुक्ल, सारस्वत मोहन मनीषी, हरेराम समीप, उदयभानु हंस आदि का योगदान रहा है| किन्तु दोहे को लोकप्रियता के शिखर पर ले जाने का श्रेय रघुविन्द्र यादव और हरेराम समीप को जाता है| जहाँ श्री समीप के खुद के चार दोहा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, वहीं उन्होंने ‘समकालीन दोहा कोश’ का सम्पादन कर ऐतिहासिक कार्य किया है| वहीं रघुविन्द्र यादव के तीन दोहा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, उन्होंने चार दोहा संकलनों का सम्पादन किया है| साथ की पत्रिका के दो दोहा विशेषांक प्रकाशित किये हैं| उनके कुछ दोहों के विडियो पूरे सोशल मीडिया पर छाये हुए हैं| सुपरटोन डिजिटल द्वारा रिकॉर्ड किया गया उनके दोहों का एक विडियो तो अब तक एक करोड़ चालिस लाख बार देखा जा चुका है| जो संत कबीर के दोहों के बाद सर्वाधिक देखा जाने वाला विडियो बन चुका है| 

    श्री पाल भसीन हरियाणा के पहली पीढ़ी के समकालीन दोहाकार हैं| कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि से आपके दोहे उत्कृष्ट हैं| उनके संग्रह ‘अमलतास की छाँव’ से बानगी स्वरूप कुछ दोहे- 

धूल-धूल हर स्वप्न है, शूल-शूल हर राह| 
धुआँ-धुआँ हर श्वास है, चुका-चुका उत्साह|| 

कलियाँ चुनता रह गया, गुँथी नहीं जयमाल| 
झुका पराजय बोझ से, यह गर्वोन्नत भाल|| 

कर हस्ताक्षर धूप के, खिला गुलाबी रूप| 
चले किरण दल पाटने, अन्धकार के कूप|| 

    डॉ. राधेश्याम शुक्ल सप्तपदी में शामिल प्रमुख दोहकारों में से एक हैं| उनके संग्रह ‘दरपन वक़्त के’ में पारिवारिक रिश्तों, परदेसी की पीड़ा, ग्राम्यबोध, स्त्री विमर्श जैसे अनछुए किन्तु महत्त्वपूर्ण विषयों पर दोहे शामिल हैं| जैसे- 

बेटी मैना दूर की, चहके करे निहाल| 
वक़्त हुआ तो उड़ चली, ताज पीहर की डाल|| 

प्रत्यय है, उपसर्ग है, औरत संधि, समास| 
है जीवन का व्याकरण, सरल वाक्य विन्यास|| 

छोटी करके थक गए, ज्ञानी संत फ़कीर| 
बनी हुई है आज भी, औरत बड़ी लकीर|| 

     श्री हरेराम समीप जन सरोकार के कवि हैं| उनके दोहों में व्यंग्य एक महत्वपूर्ण तत्व है। चुटीले व्यंग्य के माध्यम से राजनीतिक विसंगति और सत्ता के छद्म का खुलासा करते हैं। उनके दोहा संग्रह ‘जैसे’, ‘साथ चलेगा कौन’ ‘चलो एक चिट्ठी लिखे’ और ‘पानी जैसा रंग’ से कुछ दोहे- 

एक अजूबा देश यह, अपने में बेजोड़|   
यहाँ मदारी हाँक ले, बंदर कई करोड़|| 

पुलिस पकड़ कर ले गई, सिर्फ उसी को साथ| 
आग बुझाने में जले, जिसके दोनों हाथ|| 

अस्पताल से मिल रही, उसी दवा की भीख| 
जिसके इस्तेमाल की, निकल गई तारीख|| 

फिर निराश मन में जगी, नव जीवन की आस| 
चिड़िया रोशनदान पर, फिर लाई है घास|| 

    डॉ. सारस्वत मोहन मनीषी भी समकालीन दोहा के साथ-साथ हरियाणवी दोहा के सशक्त हस्ताक्षर हैं| आपने न केवल हिंदी बल्कि हरियाणवी में भी साधिकार दोहे लिखे हैं। ‘मनीषी सतसई’, ‘सारस्वत सतसई’ और ‘मोहन सतसई’ से बानगी के दोहे- 

राजनीति के आजकल, ऐसे हैं हालात| 
गणिका जैसा आचरण, संतों जैसी बात|| 

सिंहासन का सत्य से, नाता दूर-सुदूर| 
विधवाओं की माँग में, कब मिलता सिन्दूर|| 

    प्रख्यात बाल साहित्यकार श्री घमंडीलाल अग्रवाल ने भी दोहा साहित्य को समृद्ध किया है| ‘चुप्पी की पाजेब’ से कुछ दोहे- 

कई मुखौटे एक मुख, दुर्लभ है पहचान| 
इंसानों के वेश में, घूम रहे शैतान|| 

कहा पेट ने पीठ से, खुलकर बारम्बार| 
तेरे मेरे बीच में, रोटी की दीवार|| 

निशिगंधा यह देख कर, हुई शर्म से लाल| 
भीड़ उन्हीं के साथ थी, जिनके हाथ मसाल|| 

    हरियाणा से राज्यकवि रहे स्व. उदयभानू हंस यूँ तो रुबाई सम्राट के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन वे अच्छे दोहाकार भी थे| ‘दोहा-सप्तशती’ से दो दोहे- 

बीत चुके पचपन बरस, हुआ देश आज़ाद| 
कौन राष्ट्रभाषा बने, सुलझा नहीं विवाद|| 

मैं दुनिया में हो गया, एक फालतू चीज| 
जैसे खूँटी पर टँगी, कोई फटी क़मीज|| 

    श्री रघुविन्द्र यादव के दोहे अनुभूति की कसौटी पर बड़े मार्मिक, प्रभावपूर्ण और दूर तक अर्थ सम्प्रेषण करने वाले कहे जा सकते हैं| सहजता में ही इनका सौष्ठव निहित है| ‘नागफनी के फूल’, ‘वक़्त करेगा फैसला’ और ‘आये याद कबीर’ से कुछ दोहे- 

कहाँ रहेंगी मछलियाँ, सबसे बड़ा सवाल| 
कब्ज़े में सब कर लिए, घडियालों ने ताल|| 

गंगू पूछे भोज से, यह कैसा इन्साफ? 
कुर्की मेरे खेत की, क़र्ज़ सेठ का माफ़|| 

अपने भाई हैं नहीं, अब उनको स्वीकार| 
चूहे चुनना चाहते, बिल्ली को सरदार|| 

गड़बड़ मौसम से हुई या माली से भूल। 
आँगन में उगने लगे नागफनी के फूल।। 

साधारण से लोग भी, रचते हैं इतिहास। 
सीना चीर पहाड़ का, उग आती ज्यों घास।। 

     स्व. सतपाल सिंह चौहान ‘भारत’ ने विविध विषयों पर दोहे रचे हैं, जो ‘भारत दोहावली भाग-1’ और ‘भारत दोहावली भाग-2’ मे प्रकाशित हुये हैं- 

हीरे का तो मोल है, ज्ञान सदा अनमोल| 
अन्तर मन के भाव को, मत पत्थर से तोल|| 

उजियारे में बैठकर, करता काले काम| 
‘भारत’ से अंधा भला, जपे राम का नाम|| 

    लोक साहित्यकार रोहित यादव ने दोहे भी लिखे हैं| ‘जलता हुआ चिराग’ और उम्र गुजारी आस में’ से दो दोहे- 

अभी बहुत कुछ शेष है, जीवन से मत भाग| 
बुझा नहीं है आस का, जलता हुआ चिराग|| 

ऐसा भी तू क्या थका, मान रहा जो हार| 
हिम्मत अपनी बाँध ले, लक्ष्य खड़ा है द्वार|| 

    वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कृष्णलता यादव का भी एक बहुरंगी दोहा संग्रह ‘मन में खिला वसंत’ प्रकाशित हुआ है| बानगी स्वरूप कुछ दोहे- 

आँधी है बदलाव की, होते उलटे काम| 
बाबुल को वनवास दे, कलयुग वाला राम|| 

आग लगी जब महल में, कुटिया लाई नीर| 
महल तमाशा देखता, पड़ी कुटी पर भीर|| 

भारी से भारी हुई, नेताजी की जेब| 
ऊँचे दामों बिक रहे, धोखा, झूठ, फरेब|| 

    श्रीमती आशा खत्री ‘लता’ भी हरियाणा की प्रमुख महिला दोहकारों में से एक हैं। ‘लहरों का आलाप’ उनका प्रकाशित संग्रह है। कुछ दोहे इसी संग्रह से- 

जीवन भर तनहाइया, लिये तुम्हारी याद। 
पीडा का करती रही, आंसू में अनुवाद॥ 

उसको ही आता यहाँ, करना सागर पार। 
लहरों से जिसकी कभी, थमी नहीं तकरार॥ 

    हरियाणा के नये दोहकारों के संग्रह भी प्रकाशित हो रहे हैं, जो शीघ्र ही प्रकाश में आयेंगे। लघुकथा के बाद दोहा को भी हरियाणा के रचनाकारो का भरपूर प्यार मिल रहा है। 

-रघुविंद्र यादव



संदर्भ सूची-

1. साकेत सर्ग- 9 
2. ‘वक़्त करेगा फैसला’ दोहा संग्रह – रघुविंद्र यादव पृष्ठ- 9 
3. ‘बाबूजी का भारतमित्र’ दोहा विशेषांक (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 3 
4. ‘बाबूजी का भारतमित्र’ दोहा विशेषांक (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 5 
5. ‘दोहे मेरी पसंद के’ दोहा संकलन (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 5 
6. ‘दोहे मेरी पसंद के’ दोहा संकलन (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 6 

7. ‘बाबूजी का भारतमित्र’ दोहा विशेषांक (सं. रघुविन्द्र यादव) पृष्ठ- 18  

Saturday, June 13, 2020

मात्राओं की गणना कैसे करें

मात्राओं की गणना कैसे की जाती है  

मात्राओं की गणना निम्रप्रकार की जाती है-

हिन्दी भाषा के वर्णों को 12 स्वरों और 36 व्यंजनों में बाँटा गया है। सभी व्यंजनों की एक मात्रा (।) मानी जाती है। लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ की भी (।) मात्रा ही मानी जाती हैं। जबकी दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ ओ और औ की मात्राएँ दीर्घ (ऽ) मानी जाती हैं। व्यंजनों पर लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ आ रहे हों तो भी मात्रा लघु (।) ही रहेगी। किंतु यदि दीर्घ स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राएँ आ रही हों तो मात्रा दीर्घ (ऽ) हो जाती है।

अर्ध-व्यंजन और अनुस्वार/बिंदु (.)की आधी मात्रा मानी जाती है। मगर आधी मात्रा की स्वतंत्र गणना नहीं की जाती। यदि अनुस्वार अ, इ, उ अथवा किसी व्यंजन के ऊपर प्रयोग किया जाता है तो मात्राओं की गिनती करते समय दीर्घ मात्रा मानी जाती है किन्तु स्वरों की मात्रा का प्रयोग होने पर अनुस्वार (.) की मात्रा की कोई गिनती नहीं की जाती।

आधे अक्षर की स्वतंत्र गिनती नहीं की जाती बल्कि अर्ध-अक्षर के पूर्ववर्ती अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती है। यदि पूर्ववर्ती व्यंजन पहले से ही दीर्घ न हो अर्थात उस पर पहले से कोई दीर्घ मात्रा न हो। उदाहरण के लिए अंत, पंथ, छंद, कंस में अं, पं, छं, कं सभी की दो मात्राए गिनी जायेंगी इसी प्रकार शब्द, वक्त, कुत्ता, दिल्ली इत्यादि की मात्राओं की गिनती करते समय श, व, क तथा दि की दो-दो मात्राएँ गिनी जाएँगी। इसी प्रकार शब्द के प्रारंभ मेें आने वाले अर्ध-अक्षर की मात्रा नहीं गिनी जाती जैसे स्वर्ण, प्यार, त्याग आदि शब्दों में स्, प् और त् की गिनती नहीं की जाएगी। प्रारम्भ में संयुक्त व्यंजन आने पर उसकी एक ही मात्रा गिनी जाती है। जैसे श्रम, भ्रम, प्रभु, मृग। इन शब्दों मेें श्र, भ्र, प्र तथा मृ की एक ही मात्रा गिनी जाएगी।

अनुनासिक/चन्द्र बिन्दु की कोई गिनती नहीं की जाती। जैसे- हँस, हँसना, आँख, पाँखी, चाँदी आदि शब्दों में अनुनासिक का प्रयोग होने के कारण इनकी कोई मात्रा नहीं मानी जाती।

-रघुविन्द्र यादव 





समकालीन दोहा, नया दोहा या आधुनिक दोहा की विशेषताएं

दोहा

दोहा एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है|  यह भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित और लोकप्रिय रहा है| यह संस्कृत से भाषाओँ के विकास के साथ-साथ हिंदी में आया है| संस्कृत में इसे ‘दोग्धक’ कहा जाता था| जिसका अर्थ है- जो श्रोता या पाठक के मन का दोहन करे| इसे दोहक, दूहा, दोहरा, दोहड़ा, दोहयं, दोहउ, दुवह और दोहअ भी कहा जाता रहा है| लेकिन अब लोकप्रिय नाम दोहा है|
दोहा 24-24 मात्राओं वाली दो पंक्तियों और चार चरणों में 13-11, 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राओं से लिखा जाता है| प्रथम और तृतीय चरण का समापन लघु गुरु से और दूसरे तथा चौथे चरण का समापन गुरु लघु से होना अनिवार्य है| 

मानक दोहा-

लोकप्रिय दोहाकार रघुविन्द्र यादव के अनुसार "दो पंक्तियों और चार चरणों में 13-11, 13-11 के क्रम में कुल 48 मात्राओं से लिखा जाने वाला छंद, दोहा कहलाता है| इससे अधिक या कम मात्रा वाली रचना मानक दोहा की श्रेणी में नहीं आती| मानक दोहे के शिल्प की आवश्यक शर्त है कि उसके प्रथम और तृतीय चरण का समापन लघु गुरु से और दूसरे तथा चौथे चरण का समापन गुरु लघु से हो| किसी भी चरण का आरम्भ पचकल और जगण शब्द से न हो| ऐसा दोहे की लय बनाये रखने के लिए अनिवार्य है| यदि कोई रचना ये शर्तें पूरी करती है तभी उसे ‘मानक दोहा’ माना जाता है|" मानक का अर्थ है वह सिद्धांत जो सर्व मान्य हो| 

परम्परागत दोहा-

जो दोहा भक्तिकाल, रीतिकाल या उससे पहले अथवा बाद में रचा गया, उसी दोहे को परम्परागत दोहा कहते हैं| जिसमें भक्ति है, उपदेश हैं, नैतिक शिक्षा है या श्रृंगार रस है| 

समकालीन दोहा/ नया दोहा/ आधुनिक दोहा-

जो दोहा आज लिखा जा रहा है, जिसका कथ्य समकालीन व मौजूदा युगबोध पर आधारित है और जिसकी भाषा भी समकालीन है| उसे ही नया दोहा, आधुनिक दोहा या समकालीन दोहा कहा जाता है| समकालीन दोहा में न तो भक्ति है, न नैतिक शिक्षा या उपदेश हैं और न ही श्रृंगार रस है| 

दोहा दरबारी बना, दोहा बना फ़कीर|
नए दौर में कह रहा, दोहा जीवन पीर||- रघुविन्द्र यादव/वक़्त करेगा फैसला 

विभिन्न विद्वानों ने समकालीन दोहा को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है| आधुनिक दोहा के पुरस्कर्ता प्रोफेसर देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ दोहे की विशेषता कुछ यूँ बताते हैं- “दोहा छंद की दृष्टि से एकदम चुस्त-दुरुस्त और निर्दोष हो| कथ्य सपाट बयानी से मुक्त हो| भाषा चित्रमयी और संगीतात्मक हो बिम्ब और प्रतीकों का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में हो| दोहे का कथ्य समकालीन और आधुनिक बोध से सम्पन्न हो| उपदेशात्मक नीरसता और नारेबाजी की फूहड़ता से मुक्त हो|”

डॉ. अनंतराम मिश्र ‘अनंत’ दोहे की आत्मकथा में लिखते हैं- “भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण, और रस मेरी आत्मा है| कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा हृदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है| प्रथम और तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय और चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं|”

श्री जय चक्रवर्ती समकालीन दोहे को परिभाषित करते हुए कहते हैं- “समकालीन दोहे का वैशिष्टय यह है कि इसमें हमारे समय की परिस्थितियों, जीवन संघर्षों, विसंगतियों, दुखों, अभावों और उनसे उपजी आम आदमी की पीड़ा, आक्रोश, क्षोभ के सशक्त स्वर की उपस्थिति प्रदर्शित होने के साथ-साथ मुक्ति के मार्ग की संभावनाएं भी दिखाई दें|”

श्री हरेराम समीप परम्परागत और आधुनिक दोहे का भेद स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- “परम्परागत दोहों से आधुनिक दोहा का सौन्दर्यबोध स्वाभाविक रूप से बदला है| अध्यात्म, भक्ति और नीतिपरक दोहों के स्थान पर अब वह उस आम-जन का चित्रण करता है, जो उपेक्षित है, पीड़ित है, शोषित है और संघर्षरत है| इस समूह के दोहे अपने नए अंदाज़ में तीव्र और आक्रामक तेवर लिए हुए हैं| अत: जो भिन्नता है वह समय सापेक्ष है| इसमें आस्वाद का अन्तर प्रमुखता से उभरा है| इन दोहों में आज का युगसत्य और युगबोध पूरी तरह प्रतिबिंबित होता है|”

डॉ.राधेश्याम शुक्ल के अनुसार, “आज के दोहे पुरानी पीढ़ी से कई संदर्भों, अर्थों आदि में विशिष्ट हैं| इनमे भक्तिकालीन उपदेश, पारम्परिक रूढ़ियाँ और नैतिक शिक्षाएँ नहीं हैं, न ही रीतिकाल की तरह श्रृंगार| अभिधा से तो ये बहुत परहेज करते हैं| ये दोहे तो अपने समय की तकरीर हैं| युगीन अमानुषी भावनाओं, व्यवहारों और परिस्थितियों के प्रति इनमें जुझारू आक्रोश है, प्रतिकार है, प्रतिवाद है|”