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Friday, October 30, 2026

समकालीन दोहा-सृजन और साहित्यिक पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष: रघुविन्द्र यादव

1. प्रस्तावक पृष्ठभूमि एवं वैचारिक दर्शन (Introduction & Ideological Vision)

समकालीन हिंदी साहित्य में परंपरा और आधुनिकता के सशक्त सेतु के रूप में रघुविन्द्र यादव एक विशिष्ट और प्रतिष्ठित नाम हैं। हरियाणा के नारनौल की साहित्यिक भूमि से आने वाले रघुविन्द्र जी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अत्यंत सुदृढ़ है। उन्होंने मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन (MMC), एम.ए. (इतिहास) और शिक्षा स्नातक (B.Ed.) की उपाधियाँ प्राप्त की हैं।
शिक्षा विभाग में एक समर्पित प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे निरंतर शब्द-साधना में लीन हैं। पत्रकारिता की तार्किकता और इतिहास-बोध के इसी अद्भुत समन्वय ने उनके लेखन को एक गंभीर वैचारिक धरातल प्रदान किया है। उनका मानना है कि साहित्य केवल स्वान्तः सुखाय न होकर समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और विद्रूपताओं को उजागर करने का एक माध्यम है।

2. साहित्यिक पत्रकारिता एवं राष्ट्रीय संपादन (Literary Journalism)

रघुविन्द्र यादव का अवदान केवल मौलिक सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में वे एक युगांतकारी स्तंभ हैं:

'बाबूजी का भारतमित्र' का ऐतिहासिक संपादन: वे वर्ष 2012 से शोध और साहित्य की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिका 'बाबूजी का भारतमित्र' के प्रकाशक और संपादक हैं। यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की छंद-परंपरा, आलोचना और समकालीन शोधपरक लेखन को एक साझा मंच प्रदान करती है। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने देश भर के स्थापित एवं नवोदित रचनाकारों की वैचारिक प्रखरता को सहेजने का महती कार्य किया है।

3. विधागत वैविध्य एवं ग्रन्थ सूची (Genre Diversity & Works)

रघुविन्द्र यादव के रचनात्मक कैनवास पर कुल 26 पुस्तकें दर्ज हैं, जिनमें 11 मौलिक और 15 संपादित कृतियाँ शामिल हैं। उनके संपादन-कर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 'अभिनंदन के स्वर', 'पर्यावरण परिचय', 'शंखनाद' 'जीने की राह' और 'मानक कुंडलिया' को छोड़कर उनकी शेष सभी संपादित कृतियाँ (कुल 10 संकलन) विशुद्ध रूप से 'दोहा संकलन' ही हैं। यह हिंदी साहित्य में दोहा विधा के प्रति उनके अनन्य समर्पण को दर्शाता है।

मौलिक कृतियाँ (Original Works)

दोहा एवं काव्य विधा :-
• नागफनी के फूल • वक्त करेगा फ़ैसला • आये याद कबीर • देख समय का फेर (दोहा-संग्रह) • मुझमें संत कबीर • कुण्डलिया कुमुद (कुण्डलिया छंद-संग्रह) • आस का सूरज (ग़ज़ल-संग्रह) • कविता के विविध रंग | 

गद्य एवं विविधा :- 
• बोलता आईना • अपनी-अपनी पीड़ा (लघुकथा-संग्रह) • कामयाबी की यात्रा (निबंध) | 

संपादित संकलन (Edited Volumes)

प्रमुख दोहा संकलन: 
• आधी आबादी के दोहे • आधुनिक दोहा • नयी सदी के दोहे • दोहे मेरी पसन्द के • दोहों में नारी • समकालीन दोहा • प्रतिरोध के दोहे • हलधर के हालात • सौनचिरैया मौन है • जलते हुए सवाल|
 
कुण्डलिया संकलन: • मानक कुण्डलिया

विविध: • जीने की राह • अभिनंदन के स्वर • पर्यावरण परिचय • शंखनाद

4. कथ्यगत विस्तार और दोहा-पुनर्जागरण (Thematic Depth & Doha Renaissance)

यादव जी के काव्य का मुख्य स्वर 'सामाजिक सरोकार' और 'प्रतिरोध' है। उनकी कालजयी कृति 'नागफनी के फूल' समकालीन व्यवस्था, नैतिक पतन और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर तीखा व्यंग्य करती है।
कबीर पंथी चेतना: उनके दोहा संग्रहों में कबीर जैसी खरी-खरी और बेबाक शैली दिखाई देती है।
शिल्प और संप्रेषणीयता: दोहा और कुण्डलिया जैसे छंदों पर उनका असाधारण अधिकार है। उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूट्यूब पर उनके छंदबद्ध सामाजिक सरोकार के वीडियो "बेटा कहता बाप से" को 2.5 करोड़ (25 Million) से अधिक व्यूज मिल चुके हैं, जो प्रिंट से लेकर डिजिटल माध्यम तक उनकी व्यापक जन-स्वीकार्यता को प्रमाणित करता है।

5. अकादमिक प्रासंगिकता एवं शोध कार्य (Academic Relevance & Research)

विश्वविद्यालयी शोध के क्षेत्र में रघुविन्द्र यादव के साहित्य को एक प्रामाणिक संदर्भ के रूप में स्वीकार किया गया है:

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से उनकी कृति 'नागफनी के फूल' में सामाजिक सरोकार विषय पर शोध कार्य संपन्न हो चुका है।
उनके विपुल साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के लिए हिंदी जगत के विद्वानों द्वारा दो प्रमुख ग्रंथों का संपादन किया गया है:
1. ‘रघुविन्द्र यादव के प्रतिनिधि दोहे’ (संपादक: श्री जय चक्रवर्ती)
2. ‘रघुविन्द्र यादव के दोहा-सृजन के विविध आयाम’ (संपादक: डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’)

6. सम्मान एवं पुरस्कार (Awards & Recognitions)

साहित्यिक पत्रकारिता और समकालीन छंद साधना में उनके अद्वितीय अवदान के लिए उन्हें देश की दर्जनों प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है, जिनमें सबसे प्रमुख है:
हरियाणा साहित्य अकादमी का 'लाला देशबन्धु गुप्त सम्मान-2021' (यह राज्य स्तरीय प्रतिष्ठित सम्मान उनकी दीर्घकालीन साहित्यिक पत्रकारिता और संपादन निष्ठा के लिए प्रदान किया गया है)।

7. उपसंहार (Conclusion)

निष्कर्षतः, रघुविन्द्र यादव का साहित्यिक सफ़र समकालीन हिंदी कविता, विशेषकर दोहा विधा को पुनर्जीवित करने वाला एक युगीन अनुष्ठान है। इतिहास की गहरी समझ और मास कम्यूनिकेशन के सिद्धांतों का व्यावहारिक उपयोग कर उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पत्रिका 'बाबूजी का भारतमित्र' के माध्यम से दोहे को समकालीन विमर्शों के केंद्र में ला खड़ा किया है। शोधार्थियों के लिए उनका साहित्य और संपादन-कर्म समाजशास्त्र, छंद-शास्त्र और साहित्यिक पत्रकारिता के अंतःसंबंधों को समझने का एक अत्यंत उर्वर क्षेत्र है।

Saturday, June 13, 2020

रघुविन्द्र यादव का साहित्यिक परिचय

रघुविन्द्र यादव का साहित्यिक परिचय

हरियाणा के कबीर कहे जाने वाले दोहाकार रघुविन्द्र यादव का जन्म 27 सितम्बर, 1966 को नारनौल (हरियाणा) के प्रतिष्ठित किसान परिवार में हुआ|

जन्म और शिक्षा-

हरियाणा के कबीर कहे जाने वाले दोहाकार रघुविन्द्र यादव का जन्म 27 सितम्बर, 1966 को नारनौल (हरियाणा) के प्रतिष्ठित किसान परिवार में हुआ|

आपकी हाई स्कूल तक की शिक्षा नीरपुर के ही वरिष्ट माध्यमिक विद्यालय में हुई, जो उस समय तक हाई स्कूल ही था| नारनौल से बारहवीं पास करने के बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातक और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर की उपाधियाँ प्राप्त की| तदुपरांत इसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और जनसंचार में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा प्राप्त किया| महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से शिक्षा स्नातक की उपाधि ली और फिर गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं तकनिकी विश्वविद्यालय, हिसार से मास्टर ऑफ़ मॉसकम्युनिकेशन की डिग्री हासिल की| इसी दौरान आपकी नियुक्ति हरियाणा के व्यावसायिक शिक्षा विभाग में वोकेशनल लेक्चरर के रूप में हो गई| इससे पूर्व आपने दैनिक ट्रिब्यून के लिए रिपोर्टिंग भी की|

प्रमुख कृतियाँ-

अब तक आपके चार दोहा संग्रह- नागफनी के फूल, वक़्त करेगा फैसला, आये याद कबीर और देख समय का फेर, दो लघुकथा संग्रह- बोलता आईना और अपनी अपनी पीड़ा, दो कुण्डलिया छंद संग्रह- मुझमें संत कबीर और कुण्डलिया कुमुद, एक ग़ज़ल संग्रह- आस का सूरज, एक कविता संग्रह- कविता के विविध रंग तथा एक निबंध संग्रह- कामयाबी की यात्रा सहित कुल 11 मौलिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं|

सम्पादित पुस्तकें-

आपने 10 दोहा संकलनों सहित कुल 15 पुस्तकों का सम्पादन भी किया है जिनमें- आधुनिक दोहा, आधी आबादी के दोहे, दोहे मेरी पसंद के, दोहों में नारी, हलहर के हालात, प्रतिरोध के दोहे, समकालीन दोहा, नयी सदी के दोहे, सोनचिरैया मौन है, जलते हुए सवाल, मानक कुण्डलिया, शंखनाद, जीने की राह, पर्यावरण परिचय, अभिनन्दन के स्वर आदि शामिल हैं|

आप शोध और साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका बाबूजी का भारतमित्र का 2009 से संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं|

पुरस्कार/सम्मान

आपको हरियाणा साहित्य अकादमी से साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला "लाला देशबंधु  गुप्त सम्मान- 2021 (राशि 2.5 लाख रुपये) सहित  दर्जनों शासकीय, सामाजिक, साहित्यिक संस्थाओं से पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं| जिनमें पंजाब कला साहित्य अकादमी, जालन्धर द्वारा विशेष अकादमी सम्मान, बाबू बालमुकुन्द गुप्त पुरस्कार (साहित्य)-2010, रेवाड़ी (हरियाणा), स्व. श्यामसुन्दर ढंड स्मृति सम्मान लालसोट (राजस्थान) और तरुण भारत पर्यावरण रक्षण सम्मान- 2013 शामिल हैं|

शोध कार्य-

आपके पहले दोहा संग्रह ‘नागफनी के फूल’ पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से लघु शोध ‘नागफनी के फूल में सामजिक सरोकार’ सम्पन्न हो चुका है| 
इसके अलावा रघुविन्द्र यादव के दोहों पर दो कृतियाँ भी प्रकाशित हुई हैं जिनमें शामिल हैं- 
रघुविन्द्र यादव के प्रतिनिधि दोहे (संपादक जय चक्रवर्ती) और 
रघुविन्द्र यादव के दोहा सृजन के विविध आयाम (संपादक डॉ. शैलेष गुप्र 'वीर') 

हरियाणा का कबीर-

आपके दोहों में कबीर की तरह अंधविश्वास और पाखंड पर जबर्दस्त प्रहार देखने को मिलता है,| आप अपनी बात बिना किसी लागलपेट के कहने का मादा रखते हैं| इसलिए आपको “हरियाणा का कबीर” और “आधुनिक कबीर” जैसे नामों से पुकारा जाता है| सोशल मीडिया पर आपके दोहों ने लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित किये हैं| आज अगर कबीर के बाद सबसे अधिक किसी के दोहे लोगों की जुबान पर हैं तो वे रघुविन्द्र यादव के हैं| आपके 8-10 दोहे तो ऐसे हैं जो करोड़ों बार देखे सुने जा चुके हैं|

“कबीर आज जिन्दा होते तो ये होते आज के दोहे”
“कबीर के आधुनिक दोहे”
“नयी सदी के दोहे”
“बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात” आदि विभिन्न शीर्षकों से रघुविन्द्र यादव के दोहे कबीर के बाद सर्वाधिक प्रसारित-प्रचारित दोहे हैं| आपने लगभग 2000 दोहों की रचना की है, तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, वहीं  आपके संपादन में 'बाबूजी का भारतमित्र' पत्रिका के दो दोहा विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं| इतना ही नहीं आपके संपादन में छ  दोहा संकलन- आधी आबादी के दोहे, आधुनिक दोहा, दोहे मेरी पसंद के, दोहों में नारी, हलहर के हालात और  नयी सदी के दोहे भी प्रकाशित हुए हैं| 'आधी आबादी के दोहे' में 22 महिला दोहकारों के दोहे शामिल करके आपने अभिनव प्रयोग किया वहीँ ‘दोहों में नारी’ नामक संकलन में आपने केवल महिला विमर्श के दोहे ही शामिल करके पुन: एक नया प्रयोग करके अपने ‘आधुनिक कबीर’ नाम को सही साबित किया है|

आप हरियाणा ही नहीं देश के श्रेष्ठ दोहकारों में से एक हैं, इसलिए आपके दोहे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और स्तरीय संकलनों में ससम्मान प्रकाशित होते हैं| उत्तर भारत का प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र “दैनिक ट्रिब्यून” तो आपके दोहों को सम्पादकीय में भी कोट करता रहा है|

आपने करीब एक दर्जन पुस्तकों की भूमिका/अभिमत लिखें हैं वहीं करीब दो दर्जन दोहा कृतियों की दैनिक ट्रिब्यून और बाबूजी का भारतमित्र के लिए समीक्षा भी की है|

दोहा पर ही आधारित कुंडलिया छंद में भी आप पारंगत हैं| आपके दो कुंडलिया संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, वहीं एक संकलन का आपने सम्पादन भी किया है| आपने बाबूजी का भारतमित्र में देश-दुनिया का पहला कुण्डलिया विशेषांक प्रकाशित करके ऐतिहासिक कार्य किया है|